Monday, August 24, 2026
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हरसिमरत के बयान ने बढ़ाई गठबंधन की चर्चा, क्या पंजाब में फिर साथ आएंगे पुराने साथी?

चंडीगढ़ 
पंजाब में शिरोमणि अकाली दल और भाजपा के गठबंधन की सुगबुगाहट तेज होने लगी है। संत हरचंद सिंह लोंगोवाल की 41वीं पुण्यतिथि पर आयोजित रैली में हरसिमरत कौर बादल के बयान ने इन चर्चाओं को बल दिया है।

हरसिमरत ने सीधे तौर पर भाजपा का नाम नहीं लिया लेकिन उनके शब्दों को एक बड़े राजनीतिक फैसले की आहट माना जा रहा है। उन्होंने दिल्ली के साथ तालमेल और समझौते की जरूरत पर जोर दिया। यह संकेत दिया कि पंजाब के विकास के लिए केंद्र के साथ बेहतर संबंध जरूरी हैं।

दोनों को हो सकता है फायदा
बीजेपी नेताओं का मानना है कि अकाली दल के साथ गठबंधन दोनों पार्टियों के लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद हो सकता है। उनका आकलन है कि दोनों दलों के साथ आने से पंजाब के चुनावी मुकाबले में जीत की संभावनाएं मजबूत होंगी। हालांकि, इसके लिए दोनों पार्टियों को अपने मौजूदा वोट बैंक से आगे बढ़कर समर्थन आधार मजबूत करना होगा। बता दें कि पंजाब की मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में बीजेपी और अकाली दल के संभावित गठबंधन को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अगर दोनों दल सीटों के बंटवारे पर सहमति बना लेते हैं, तो कांग्रेस, AAP और अन्य दलों के बीच होने वाले मुकाबले में एक नया सियासी समीकरण तैयार हो सकता है। हालांकि, अंतिम फैसला दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व की बातचीत और सीटों के बंटवारे पर निर्भर करेगा।

लोकसभा चुनाव के आंकड़े बढ़ा रहे गठबंधन उम्मीद?
बीजेपी नेता पिछले लोकसभा चुनाव के आंकड़ों को गठबंधन के पक्ष में सबसे बड़ा आधार मान रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी और अकाली दल ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। बीजेपी राज्य की 13 लोकसभा सीटों में से एक भी सीट नहीं जीत सकी, लेकिन उसे 18.56 प्रतिशत वोट मिले। वहीं, अकाली दल ने 13.42 प्रतिशत वोट हासिल किए और एक सीट जीतने में सफल रहा। दोनों दलों का वोट शेयर जोड़ने पर करीब 32 प्रतिशत बैठता है। बीजेपी का मानना है कि अगर दोनों पार्टियों के वोट एकजुट होते हैं और कुछ अतिरिक्त समर्थन भी मिलता है तो सत्ताधारी आम आदमी पार्टी के सामने मजबूत चुनौती खड़ी की जा सकती है।

विधानसभा चुनाव में क्या रही थी स्थिति
हालांकि, पिछले विधानसभा चुनावों के आंकड़े दोनों दलों के लिए चिंता का विषय भी हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में अकाली दल को 18.38 प्रतिशत वोट मिले और वह 117 में से केवल तीन सीटें जीत सका। वहीं, बीजेपी को सिर्फ 6.60 प्रतिशत वोट मिले और उसने दो सीटों पर ही जीत दर्ज की। लोकसभा चुनाव में बीजेपी का वोट शेयर विधानसभा चुनाव की तुलना में करीब तीन गुना रहा। यही वजह है कि संभावित गठबंधन में बीजेपी के अधिक विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की संभावना जताई जा रही है।

38 सीटों पर बीजेपी ने दिखाई मजबूत स्थिति
लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी 23 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही, जबकि अकाली दल नौ क्षेत्रों में बढ़त बनाने में सफल रहा। बीजेपी करीब 17 विधानसभा क्षेत्रों में दूसरे स्थान पर रही, जबकि अकाली दल 14 सीटों पर दूसरे नंबर पर रहा। बीजेपी पांच सीटों पर 5000 से कम वोटों के अंतर से और 10 सीटों पर 10000 से कम वोटों के अंतर से पीछे रही। इस तरह अकेले चुनाव लड़ने के बावजूद बीजेपी ने करीब 38 विधानसभा क्षेत्रों में अपनी मजबूत स्थिति का संकेत दिया।

दोनों पार्टियों के बीच पुरानी दोस्त
बीजेपी और अकाली दल के बीच गठबंधन नया नहीं है। दोनों दल 1996 से 2020 तक लंबे समय तक साथ रहे। 1997 के विधानसभा चुनाव में गठबंधन ने शानदार जीत दर्ज की थी। उस समय अकाली दल ने 75 और BJP ने 18 सीटें जीती थीं। 2007 में भी दोनों दलों ने मिलकर सरकार बनाई। अकाली दल को 49 और बीजेपी को 19 सीटें मिलीं। इसके बाद 2012 में गठबंधन ने लगातार दूसरी बार सत्ता हासिल कर इतिहास रचा। उस चुनाव में अकाली दल ने 56 और BJP ने 12 सीटें जीती थीं।

उनके बयान ने उन अटकलों को हवा दी है कि 2020 में अलग हुए दोनों पुराने सहयोगी फिर किसी राजनीतिक समझौते की ओर बढ़ सकते हैं। अकाली दल और भाजपा का गठबंधन पंजाब की राजनीति में करीब ढाई दशक तक एक मजबूत चुनावी समीकरण रहा है। यह गठबंधन 1997 से 2012 के दौर में अकाली दल के लिए सत्ता तक पहुंचने का मजबूत चुनावी फॉर्मूला साबित हुआ।

अकाली दल-भाजपा गठबंधन ने 1997 के विधानसभा चुनाव में 93 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी। इसमें अकाली दल की 75 और भाजपा की 18 सीटें शामिल थीं। 2007 में दोनों दलों ने 68 सीटें जीतकर सत्ता में वापसी की। अकाली दल ने 49 और भाजपा ने 19 सीटें जीती थीं। 2012 का चुनाव इस गठबंधन के लिए महत्वपूर्ण रहा।

गठबंधन ने कुल 68 सीटों के साथ लगातार दूसरी बार सरकार बनाई। राज्य के पुनर्गठन के बाद यह पहली बार था कि कोई सत्तारूढ़ गठबंधन लगातार दूसरी बार जीता था। 2017 में इस राजनीतिक समीकरण की चमक फीकी पड़ गई। अकाली दल को 15 और भाजपा को तीन सीटें मिलीं। 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों ने मिलकर चार सीटें जीतीं। सितंबर 2020 में कृषि कानून विवाद के कारण अकाली दल ने भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए से अलग होने का फैसला किया।

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