Monday, June 15, 2026
Google search engine
Homeराज्यमध्य प्रदेशGDP में गिने जाएंगे गृहिणियों के श्रम के घंटे? सुप्रीम कोर्ट की...

GDP में गिने जाएंगे गृहिणियों के श्रम के घंटे? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद उठे बड़े सवाल

भोपाल

सर्वोच्च न्यायालय ने 11 जून को फैसला सुनाया कि मोटर दुर्घटना में मृत्यु होने पर मुआवज़ा तय करते समय गृहिणियों द्वारा किए गए अवैतनिक घरेलू श्रम को एक स्वतंत्र आर्थिक मूल्य दिया जाना चाहिए। इसके लिए न्यायालय ने प्रति माह ₹30,000 की न्यूनतम काल्पनिक आय निर्धारित की। गृहिणियों को "राष्ट्र निर्माता" मानते हुए, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मोटर दुर्घटना दावों में "घरेलू देखभाल की हानि" नामक मुआवज़े का एक अलग मद बनाया और इस राशि में हर तीन साल में 10% की वृद्धि अनिवार्य की।

टीसर्वोच्च न्यायालय ने 11 जून को फैसला सुनाया कि मोटर दुर्घटना में मृत्यु होने पर मुआवज़ा तय करते समय गृहिणियों द्वारा किए गए अवैतनिक घरेलू श्रम को एक स्वतंत्र आर्थिक मूल्य दिया जाना चाहिए। इसके लिए न्यायालय ने प्रति माह ₹30,000 की न्यूनतम काल्पनिक आय निर्धारित की। गृहिणियों को "राष्ट्र निर्माता" मानते हुए, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने मोटर दुर्घटना दावों में "घरेलू देखभाल की हानि" नामक मुआवज़े का एक अलग मद बनाया और इस राशि में हर तीन साल में 10% की वृद्धि अनिवार्य की।

विवाद क्या था?
यह फैसला पंजाब में एक मोटर दुर्घटना के दावे से संबंधित अपील पर आया है। नवंबर 2001 में एक सड़क दुर्घटना में रेशमा नाम की महिला की मृत्यु के बाद, उनके पति और तीन बच्चों ने मुआवजे के लिए मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) से संपर्क किया। दिसंबर 2003 में, न्यायाधिकरण ने ₹2.42 लाख का मुआवजा दिया। इससे असंतुष्ट होकर परिवार ने पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में अपील की। ​​दिसंबर 2024 में, उच्च न्यायालय ने मुआवजे की राशि बढ़ाकर ₹8.43 लाख कर दी, साथ ही दावा याचिका दायर करने की तारीख से 7.5% की दर से ब्याज भी लगाया। न्यायालय ने कहा कि यदि राशि का भुगतान तीन महीने के भीतर नहीं किया जाता है, तो ब्याज दर बढ़कर 9% प्रति वर्ष हो जाएगी, और यदि भुगतान में छह महीने से अधिक की देरी होती है, तो यह 12% प्रति वर्ष हो जाएगी। मुआवजे की राशि से असंतुष्ट होकर परिवार ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया।

 सुबह की पहली चाय से लेकर रात के अंतिम काम तक, करोड़ों भारतीय गृहिणियां बिना वेतन, बिना छुट्टी और बिना किसी औपचारिक मान्यता के लगातार काम करती हैं। खाना बनाना, बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल, घर का बजट संभालना, परिवार के स्वास्थ्य का ध्यान रखना और भावनात्मक सहारा बनना—ये ऐसे कार्य हैं जिन पर पूरे परिवार की नींव टिकी होती है।

इसके बावजूद देश की आर्थिक व्यवस्था में इन कार्यों को लगभग अदृश्य माना जाता है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने गृहिणियों को राष्ट्रनिर्माता बताते हुए उनके श्रम को आर्थिक मूल्य देने की आवश्यकता पर जोर दिया है। इसके बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि क्या गृहिणियों के अवैतनिक श्रम को देश की जीडीपी और आर्थिक गणनाओं में शामिल किया जाना चाहिए।

जीडीपी में क्यों नहीं दिखता गृहिणियों का योगदान?
    सकल घरेलू उत्पाद (GDP) किसी देश में होने वाली आर्थिक गतिविधियों का मूल्यांकन करता है, लेकिन इसमें केवल वही कार्य शामिल होते हैं जिनमें पैसों का लेन-देन होता है। यही कारण है कि यदि कोई महिला अपने परिवार के लिए भोजन तैयार करती है तो उसका आर्थिक मूल्य नहीं गिना जाता, लेकिन वही भोजन किसी होटल या रेस्टोरेंट में तैयार हो तो वह जीडीपी का हिस्सा बन जाता है।

    इसी तरह यदि कोई बेटी अपने बुजुर्ग माता-पिता की देखभाल करती है तो उसका योगदान आर्थिक आंकड़ों में दर्ज नहीं होता, जबकि किसी अस्पताल या केयर सेंटर द्वारा दी गई वही सेवा जीडीपी में शामिल हो जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यही वह बड़ी खामी है जिसके कारण महिलाओं के घरेलू श्रम का वास्तविक मूल्य सामने नहीं आ पाता।

भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी अनदेखी सब्सिडी
    विकास विशेषज्ञ डॉ. विकास सिंह के अनुसार भारत का विकास मॉडल करोड़ों महिलाओं द्वारा दिए जा रहे मुफ्त श्रम पर आधारित है। उनका कहना है कि देश की लाखों गृहिणियां ऐसी सेवाएं दे रही हैं जिनके लिए यदि पेशेवर कर्मचारी रखे जाएं तो भारी आर्थिक खर्च आएगा।

    एसबीआई की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में गृहिणियों के अवैतनिक श्रम का आर्थिक मूल्य देश की जीडीपी का लगभग 15 से 17 प्रतिशत तक हो सकता है। यह योगदान कई बड़े आर्थिक क्षेत्रों के बराबर या उनसे अधिक माना जाता है। इसके बावजूद गृहिणियों को आधिकारिक रूप से "आर्थिक रूप से निष्क्रिय" श्रेणी में रखा जाता है।

समय का सबसे बड़ा निवेश महिलाएं कर रही हैं
    भारत सरकार के टाइम-यूज सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि भारतीय महिलाएं प्रतिदिन औसतन सात घंटे घरेलू कार्यों में लगाती हैं। इसके विपरीत पुरुष औसतन केवल एक घंटा घरेलू कार्यों के लिए देते हैं।

    यह अंतर केवल श्रम का नहीं बल्कि अवसरों का भी है। घरेलू जिम्मेदारियों के कारण बड़ी संख्या में महिलाएं नौकरी, व्यवसाय, उच्च शिक्षा और व्यक्तिगत विकास के अवसरों से दूर रह जाती हैं। यही कारण है कि भारत में महिला श्रम भागीदारी दर अभी भी अपेक्षाकृत कम है।

घरेलू श्रम के तीन बड़े स्तंभ

    गृहिणियों का योगदान केवल खाना बनाने तक सीमित नहीं है।
    भोजन और पोषण
    परिवार के प्रत्येक सदस्य के लिए संतुलित और स्वास्थ्यवर्धक भोजन की व्यवस्था करना।
    बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल
    शिक्षा, स्वास्थ्य, भावनात्मक समर्थन और सुरक्षा सुनिश्चित करना।
    घर का प्रबंधन
    सफाई, बजट, खरीदारी, समय प्रबंधन और दैनिक आवश्यकताओं का संचालन करना।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन सभी सेवाओं के लिए अलग-अलग पेशेवर कर्मचारी नियुक्त किए जाएं तो प्रति परिवार कम से कम 15 हजार रुपये प्रतिमाह या उससे अधिक का खर्च आ सकता है।

दुनिया के कई देशों ने दी है मान्यता
    घरेलू श्रम को औपचारिक मान्यता देने के प्रयास दुनिया के कई देशों में किए गए हैं।
    स्वीडन में बच्चों और परिवार की देखभाल में बिताए गए वर्षों के आधार पर महिलाओं को पेंशन क्रेडिट दिया जाता है। इससे उनकी सामाजिक सुरक्षा मजबूत होती है।

    कनाडा नियमित सर्वेक्षणों के माध्यम से घरेलू कार्यों में खर्च होने वाले समय का आकलन करता है और इन आंकड़ों का उपयोग सार्वजनिक नीतियां बनाने में करता है।
    विशेषज्ञों का मानना है कि भारत भी ऐसी व्यवस्थाओं से सीख लेकर महिलाओं के श्रम को अधिक सम्मान और सुरक्षा प्रदान कर सकता है।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी क्यों महत्वपूर्ण है?
    उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान गृहिणियों को राष्ट्रनिर्माता बताया। न्यायालय ने कहा कि घरेलू कार्यों का समाज और अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान है, जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता।

    यह टिप्पणी केवल भावनात्मक नहीं बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे भविष्य में गृहिणियों के लिए सामाजिक सुरक्षा, पेंशन और आर्थिक मान्यता से जुड़े नए रास्ते खुल सकते हैं।

क्या गृहिणियों को वेतन मिलना चाहिए?
    इस विषय पर विशेषज्ञों की राय अलग-अलग है। कुछ लोगों का मानना है कि घरेलू श्रम को प्रत्यक्ष वेतन देना व्यावहारिक नहीं होगा, लेकिन इसके लिए पेंशन, बीमा, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक पहचान जैसी व्यवस्थाएं विकसित की जा सकती हैं।

दूसरी ओर कुछ लोगों का तर्क है कि परिवार में गृहिणी के सभी खर्च पति द्वारा वहन किए जाते हैं, इसलिए अलग से आर्थिक मूल्यांकन की आवश्यकता नहीं है। हालांकि महिला अधिकारों और विकास नीति के विशेषज्ञ मानते हैं कि आर्थिक निर्भरता और आर्थिक मान्यता दोनों अलग विषय हैं।

इसके क्या परिणाम होंगे?
इस फैसले में ₹30,000 की राशि तक पहुंचने के लिए किसी विशिष्ट गणितीय या अनुभवजन्य आधार का उल्लेख नहीं किया गया है, हालांकि इसमें यह स्वीकार किया गया है कि "सख्त गणितीय गणना" गृहणियों की आर्थिक, सामाजिक और राष्ट्र निर्माण में भूमिका को पूरी तरह से नहीं दर्शा सकती। हालांकि न्यायालय ने पहले भी गृहणियों की सेवाओं को केवल इसलिए आर्थिक मूल्यहीन मानने के खिलाफ चेतावनी दी है क्योंकि वे औपचारिक आय उत्पन्न नहीं करती हैं, लेकिन यह पहली बार है जब इसने घरेलू देखभाल के नुकसान का आकलन करने के लिए एक ठोस न्यूनतम मानदंड निर्धारित किया है।

देश की जीडीपी का 7 प्रतिशत तक हो सकता है गृहणियों के श्रम का आर्थिक मूल्य

घरों में करोड़ों गृहणियां (Housewives) जो अवैतनिक श्रम करती हैं, उनके श्रम का आर्थिक मूल्य जीडीपी का 7 प्रतिशत तक हो सकता है. उद्योग संघ फिक्की लेडीस आर्गनाइजेशन (FICCI Ladies Organization) की अध्यक्ष सुधा शिवकुमार ने  बातचीत में यह अहम बात कही. फिलहाल घरों में गृहणियों द्वारा किए गए काम को औपचारिक तौर पर श्रम के रूप में नहीं पहचाना जाता है. इसे GDP के आकलन में भी शामिल नहीं किया जाता है। 

गृहिणी के रूप में करोड़ों घरों में महिलाओं द्वारा किया जाने वाला अवैतनिक श्रम बेहद महत्वपूर्ण है, और देश की जीडीपी के आकलन में इसके आर्थिक मूल्य को भी शामिल किया जाना चाहिए. उद्योग संघ फिक्की लेडीस आर्गनाइजेशन की ताजा रिपोर्ट में यह बात कही गई है। 

 आर्गनाइजेशन की अध्यक्ष सुधा शिवकुमार ने कहा, गृहणियों के अवैतनिक श्रम को महत्व देना बेहद जरूरी है, क्योंकि इसका आर्थिक मूल्य देश की जीडीपी का 7 फीसदी तक हो सकता है। 

सुधा शिवकुमार ने कहा, "इंटरनेशनल लेबर आर्गनाइजेशन, संयुक्त राष्ट्र और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) ने गृहिणियों द्वारा किए गए अवैतनिक कार्यों के आर्थिक मूल्यांकन पर कई अध्ययन किए हैं. एक सामान्य गणना के अनुसार गृहिणियों द्वारा किए गए अवैतनिक कार्यों का आर्थिक मूल्य सकल घरेलू उत्पाद के 7% तक हो सकता है। 

 

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments