Tuesday, September 15, 2026
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किसाऊ परियोजना को मिलेगी रफ्तार, छह राज्यों के बीच आज होगा जल वितरण समझौता

चंडीगढ़
करीब छह दशक से लंबित अंतरराज्यीय जल विवाद के समाधान की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठने जा रहा है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश की सीमा पर टोंस नदी पर प्रस्तावित किसाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना को लेकर छह राज्यों के बीच जल वितरण समझौते को 15 सितंबर को अंतिम रूप दिए जाने की तैयारी है।

15 जून को केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल की अध्यक्षता में हुई बैठक में सभी संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री जल वितरण के प्रस्ताव पर सहमत हो चुके हैं। अब नई दिल्ली स्थित जल शक्ति भवन में होने वाली बैठक में हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के शीर्ष अधिकारी समझौते पर हस्ताक्षर के साथ करीब छह दशक से अटकी इस परियोजना के समझौता पत्र पर हस्ताक्षर करेंगे। संबंधित राज्यों के मुख्यमंत्री भी बैठक में मौजूद रह सकते हैं।

परियोजना के तहत हरियाणा को 836 क्यूसेक पानी मिलने का प्रस्ताव है। वहीं, उत्तर प्रदेश को 543.2 क्यूसेक, राजस्थान को 163.52 क्यूसेक और दिल्ली को 105.28 क्यूसेक पानी मिलेगा। इस लिहाज से परियोजना केवल एक राज्य की जल जरूरत पूरी करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्तर भारत के कई राज्यों के लिए जल उपलब्धता और अंतरराज्यीय समन्वय को मजबूत करने वाली पहल बन सकती है।

जल बंटवारे के विवाद से सहयोग की ओर बढ़ेंगे राज्य
अंतरराज्यीय नदियों के पानी के बंटवारे को लेकर राज्यों के बीच लंबे समय से मतभेद रहे हैं। किसाऊ परियोजना पर प्रस्तावित समझौता ऐसे विवादों के समाधान के लिए सहमति आधारित माडल का उदाहरण बन सकता है।

हरियाणा को मिलने वाला पानी उसकी जल जरूरतों के लिए महत्वपूर्ण होगा, जबकि दिल्ली को अतिरिक्त जल उपलब्धता से राष्ट्रीय राजधानी की जरूरतों को राहत मिल सकती है। उत्तर प्रदेश और राजस्थान को मिलने वाला निर्धारित पानी भी इन राज्यों की जल उपलब्धता को मजबूत करेगा।

छह दशक की देरी के बाद परियोजना को गति मिलने की उम्मीद
लंबे समय तक परियोजना के अटके रहने से इसकी लागत में भी बड़ा इजाफा हुआ है। अब इसकी अनुमानित लागत करीब 15,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है, जबकि पहले यह रकम आधी थी।

ऐसे में छह राज्यों के बीच समझौता होने से परियोजना को संस्थागत आधार मिलने के साथ इसके निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने की उम्मीद है। टोंस नदी पर प्रस्तावित यह बहुउद्देशीय परियोजना जल संसाधनों के बेहतर उपयोग के साथ राज्यों के बीच सहयोग की नई राह भी खोल सकती है।

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