Monday, July 27, 2026
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कांवड़ की पूरी कहानी: बांस से सजावट तक, जानें कीमत और महत्व

 पटना
 सावन का महीना शुरू होने से पहले पटना के बाजारों में कांवड़ की खरीदारी और सजावट का काम तेज हो गया है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जिस कांवड़ को लेकर श्रद्धालु देवघर पहुंचते हैं, वह बनती किस चीज से है, इसकी कीमत कितनी होती है और इसे सजाने में किन चीजों का इस्तेमाल किया जाता है? आइए जानते हैं कांवड़ की पूरी कहानी।

हावड़ा के खास बांस से तैयार होती है कांवड़
पटना के न्यू मार्केट में बिकने वाली कई कांवड़ हावड़ा के सेवड़ाफुली के बांस से तैयार की जाती हैं।

कांवड़ बनाने के लिए बांस को आकार देकर मजबूत ढांचा तैयार किया जाता है। इसके बाद श्रद्धालुओं की पसंद और बजट के अनुसार इसे सजाया जाता है।

न्यू मार्केट स्थित तनिष्का ट्रेडर्स के संचालक विनोद कुमार बताते हैं कि उनके यहां वर्ष 1967 से कांवड़ बनाने का काम हो रहा है। पहले पिता और दादा इस काम को संभालते थे, अब नई पीढ़ी इसे आगे बढ़ा रही है।

500 रुपये से शुरू, 40 हजार तक पहुंचती है कीमत
कांवड़ की कीमत 500 रुपये से शुरू होकर 40 हजार रुपये तक जाती है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा और बजट के अनुसार कांवड़ बनवाते हैं। खास सजावट और पीतल पर चांदी का पानी चढ़ाने के बाद इसकी कीमत और बढ़ जाती है।

महंगाई के कारण इस वर्ष कांवड़ बनाने वाली सामग्री के दाम बढ़े हैं। ऐसे में बड़ी संख्या में श्रद्धालु कम कीमत वाली कांवड़ खरीदना पसंद कर रहे हैं।

देवघर जाने वाले कई श्रद्धालुओं ने एक महीने पहले ही कांवड़ का आर्डर दे दिया है।
मुरादाबाद से आता है पीतल का सामान, ऐसे सजती है कांवड़

कांवड़ को आकर्षक बनाने के लिए मुरादाबाद से पीतल की सामग्री मंगाई जाती है। इसमें घंटी, घुंघरू, नंदी, शिवलिंग, जलपात्र और त्रिशूल जैसी चीजें शामिल हैं। श्रद्धालु अपनी पसंद के अनुसार इनसे कांवड़ को सजवाते हैं।

कांवड़ पर लगने वाली पीतल की सामग्री में घंटी करीब 30 रुपये, घुंघरू 10 रुपये, धूपदान 100 रुपये, पीतल शिवलिंग 250 रुपये, शिव प्रतिमा 150 रुपये और त्रिशूल 150 रुपये प्रति पीस मिलता है।

कांवड़ पर सजे नंदी से त्रिशूल तक का भी है खास महत्व
ज्योतिषाचार्य पंडित राघव नाथ झा के अनुसार कांवड़ यात्रा केवल गंगाजल लाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करने की परंपरा नहीं है।

कांवड़ पर सजने वाले नंदी, त्रिशूल, डमरू, शिवलिंग और नाग का भी धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है।

नंदी धर्म, सत्य और सेवा का प्रतीक हैं। त्रिशूल आत्मसंयम और तीन प्रकार के तापों से मुक्ति का संदेश देता है।

डमरू सृष्टि के आदि नाद और सृजन का प्रतीक माना जाता है, जबकि शिवलिंग अनादि-अनंत परमशिव का प्रतीक है।

पटना में घट रही कांवड़ की दुकानें, फिर भी परंपरा जारी
कारोबारियों के अनुसार पहले न्यू पटना मार्केट में कांवड़ की आठ से दस दुकानें होती थीं, लेकिन अब नई पीढ़ी इस पारंपरिक कारोबार से दूर हो रही है।

इसके बावजूद जो लोग कांवड़ बनाना जानते हैं, वे सेवा भाव से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

पटना के अलावा बाढ़, बख्तियारपुर, मोकामा और आसपास के जिलों से भी श्रद्धालु यहां कांवड़ बनवाने आते हैं।

सावन के साथ ही बाजार में एक बार फिर कांवड़ की मांग बढ़ गई है और कारीगर श्रद्धालुओं की पसंद के अनुसार कांवड़ तैयार करने में जुटे हैं।

 

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