रायपुर
कभी रोजगार के साधनों की कमी और आर्थिक निर्भरता ग्रामीण महिलाओं के आगे बढ़ने की राह में बड़ी चुनौती थी। आज वही महिलाएं अपने हुनर, मेहनत और हौसले से स्वरोजगार की नई राह बना रही हैं। कोई अपने हाथों के हुनर से खस की आकर्षक कलाकृतियां तैयार कर रही है, तो कोई ऑटो रिक्शा चलाने के साथ किराना दुकान संभालकर परिवार की आर्थिक ताकत बन रही है। छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ से जुड़ी सरगुजा की महिलाओं की ये कहानियां आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ते ग्रामीण छत्तीसगढ़ की तस्वीर पेश करती हैं।
सेवा संकल्प अभियान के बीच सामने आई लखनपुर विकासखंड के ग्राम लटोरी की स्व-सहायता समूह की महिलाओं और बतौली विकासखंड के ग्राम तारागी की मती सूरजपति की सफलता की कहानी बताती है कि जब महिलाओं के हुनर को प्रशिक्षण, आर्थिक सहयोग और आगे बढ़ने का अवसर मिलता है, तो वे अपनी मेहनत से परिवार की परिस्थितियां बदलने के साथ समाज में अपनी अलग पहचान भी बना सकती हैं।
एक ओर लटोरी की 20 महिलाएं हस्तशिल्प के अपने हुनर को बाजार से जोड़कर आजीविका की नई राह पर आगे बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर सूरजपति ने समूह से मिले 60 हजार रुपये के ऋण को अपनी मेहनत से दो व्यवसायों में बदल दिया। आज ऑटो रिक्शा और किराना दुकान से होने वाली आय ने उन्हें ‘लखपति दीदी’ की पहचान दिलाई है।
हुनर को मिला प्रशिक्षण, हाथों को मिला रोजगार
लखनपुर विकासखंड के ग्राम पंचायत लटोरी की महामाया और रेखा स्व-सहायता समूह से जुड़ी 20 महिलाओं ने दिखाया है कि हाथों के हुनर को सही प्रशिक्षण और अवसर मिले तो वही हुनर आजीविका का मजबूत आधार बन सकता है।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत इन महिलाओं को हस्तशिल्प बोर्ड के माध्यम से विशेष प्रशिक्षण दिया गया। प्रशिक्षण के बाद महिलाओं ने खस से आकर्षक और पर्यावरण अनुकूल उत्पाद तैयार करना शुरू किया। उनके हाथों से कलात्मक डलिया, टोकरी, सजावटी गुलदस्ते, पूजा की ट्रे और फ्रूट बास्केट जैसे विभिन्न उत्पाद आकार ले रहे हैं।
स्थानीय स्तर पर तैयार ये उत्पाद पर्यावरण अनुकूल होने के साथ महिलाओं की रचनात्मकता और कौशल की पहचान भी बन रहे हैं। बाजार में इन उत्पादों की मांग ने महिलाओं को अपने हुनर को आजीविका में बदलने का अवसर दिया है। अब उनके हाथों से तैयार उत्पाद घर की चौखट से निकलकर बाजार तक पहुंच रहे हैं और परिवार की आय में योगदान दे रहे हैं।
‘पहले रोजगार नहीं था, अब अपना काम है’
रेखा महिला स्व-सहायता समूह की सदस्य मती कौशल्या राजवाड़े के लिए यह बदलाव विशेष मायने रखता है। उनके अनुसार पहले उनके पास रोजगार का कोई साधन नहीं था। बिहान से जुड़ने और हस्तशिल्प का प्रशिक्षण मिलने के बाद आज उनके पास अपना काम और आय अर्जित करने का अवसर है।
कौशल्या और समूह की अन्य महिलाओं की आकांक्षाएं अब केवल उत्पाद बनाने तक सीमित नहीं हैं। वे अपने व्यवसाय को और आगे बढ़ाना चाहती हैं। उनका सपना है कि उनके हाथों से तैयार उत्पादों की पहचान गांव से निकलकर बड़े बाजारों तक पहुंचे और उनके गांव का नाम भी रोशन हो।
उनकी यह आकांक्षा बताती है कि स्व-सहायता समूह महिलाओं को केवल आर्थिक गतिविधियों से नहीं जोड़ते, बल्कि उन्हें बड़े सपने देखने और उन सपनों को अपनी मेहनत से पूरा करने का आत्मविश्वास भी देते हैं।
सूरजपति ने 60 हजार रुपये के ऋण को बनाया आत्मनिर्भरता की पूंजी
बतौली विकासखंड के ग्राम तारागी की मती सूरजपति की कहानी बिहान से मिले अवसर को मेहनत के बल पर सफलता में बदलने का उदाहरण है। कभी आर्थिक तंगी और आय के स्थायी साधन के अभाव से जूझ रहीं सूरजपति वर्ष 2020 में बिहान के स्व-सहायता समूह से जुड़ीं।
समूह से उन्हें मार्गदर्शन के साथ आर्थिक सहयोग का रास्ता मिला। उन्होंने 60 हजार रुपये का ऋण लिया और इसे केवल घरेलू खर्च में उपयोग करने के बजाय अपने भविष्य की पूंजी बनाया।
सूरजपति ने ऑटो रिक्शा संचालन शुरू किया और साथ ही किराना दुकान भी स्थापित की। एक ही आय स्रोत पर निर्भर रहने के बजाय उन्होंने दो अलग-अलग आजीविका गतिविधियों को अपनाया। धीरे-धीरे मेहनत रंग लाई और दोनों व्यवसाय उनके परिवार की आर्थिक मजबूती का आधार बन गए।
500 रुपये प्रतिदिन की आय, बनीं ‘लखपति दीदी’
आज सूरजपति को किराना दुकान से लगभग 200 रुपये प्रतिदिन और ऑटो रिक्शा संचालन से लगभग 300 रुपये प्रतिदिन की आय हो रही है। दोनों व्यवसायों से उनकी कुल दैनिक आय लगभग 500 रुपये है और वार्षिक आय लगभग 1.80 लाख रुपये तक पहुंच गई है।
कभी आर्थिक तंगी से जूझने वाली सूरजपति आज ‘लखपति दीदी’ के रूप में अपनी नई पहचान बना चुकी हैं। यह उपलब्धि उनके लिए केवल आय का आंकड़ा नहीं है। आज वे परिवार के पालन-पोषण में आर्थिक रूप से मजबूत भागीदारी निभा रही हैं और अपने भविष्य के संबंध में स्वयं निर्णय लेने का आत्मविश्वास भी हासिल कर चुकी हैं।
60 हजार रुपये के ऋण से शुरू हुआ उनका सफर बताता है कि आर्थिक सहयोग को जब सही योजना, मेहनत और निरंतर प्रयास से जोड़ा जाता है तो छोटी शुरुआत भी आत्मनिर्भरता की बड़ी कहानी बन सकती है।
एक ओर हस्तशिल्प, दूसरी ओर ऑटो और किराना—मंजिल एक, आत्मनिर्भरता
लटोरी की 20 महिलाओं और सूरजपति की आजीविका के रास्ते अलग-अलग हैं, लेकिन मंजिल एक है—आर्थिक आत्मनिर्भरता।
लटोरी की महिलाओं ने प्रशिक्षण लेकर हस्तशिल्प को रोजगार से जोड़ा। स्थानीय संसाधनों और अपने हुनर का उपयोग कर उन्होंने पर्यावरण अनुकूल उत्पाद तैयार किए और बाजार तक पहुंचने की दिशा में कदम बढ़ाए। दूसरी ओर सूरजपति ने समूह से मिले ऋण को पूंजी बनाकर ऑटो रिक्शा और किराना दुकान के रूप में आय के दो स्रोत विकसित किए।
इन दोनों कहानियों में बिहान की भूमिका केवल आर्थिक सहायता तक सीमित नहीं है। संगठन, प्रशिक्षण, मार्गदर्शन और वित्तीय सहयोग के माध्यम से महिलाओं को अपनी क्षमता पहचानने और उसे आजीविका में बदलने का अवसर मिला है।
महिला की कमाई से मजबूत हो रहा परिवार, बढ़ रहा आत्मविश्वास
जब कोई महिला स्वयं आय अर्जित करती है तो इसका प्रभाव केवल उसकी आर्थिक स्थिति पर नहीं पड़ता, बल्कि पूरे परिवार के जीवन में दिखाई देता है। परिवार की जरूरतों को पूरा करने, बच्चों के भविष्य की योजना बनाने और आर्थिक निर्णयों में भागीदारी करने का उसका आत्मविश्वास बढ़ता है।
लटोरी की महिलाओं के लिए हस्तशिल्प आय का नया माध्यम बना है, जबकि सूरजपति के लिए ऑटो और किराना व्यवसाय आर्थिक स्थिरता का आधार बन गए हैं। दोनों उदाहरण बताते हैं कि रोजगार और स्वरोजगार के अवसर महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम बनाने के साथ उनमें अपने फैसले स्वयं लेने का भरोसा भी पैदा करते हैं।
बिहान—समूह से स्वरोजगार और स्वरोजगार से सम्मान तक
स्व-सहायता समूहों की सबसे बड़ी ताकत उनकी सामूहिकता है। महिलाएं एक साथ जुड़ती हैं, बचत करती हैं, एक-दूसरे से सीखती हैं, प्रशिक्षण प्राप्त करती हैं और उपलब्ध संसाधनों का उपयोग कर अपनी आजीविका को आगे बढ़ाती हैं। यह सामूहिकता कठिन परिस्थितियों में भी उन्हें आगे बढ़ने का भरोसा देती है।
बिहान के माध्यम से सरगुजा की महिलाएं इसी सामूहिक शक्ति को आर्थिक आत्मनिर्भरता में बदल रही हैं। उनके हाथों में केवल रोजगार नहीं आया है, बल्कि अपने पैरों पर खड़े होने और अपनी अलग पहचान बनाने का आत्मविश्वास भी आया है।
सेवा से स्वावलंबन तक, महिलाएं लिख रहीं बदलाव की नई कहानी
सेवा संकल्प अभियान के बीच लटोरी की महिलाओं और सूरजपति की कहानी जनकल्याण से स्वावलंबन तक पहुंचते बदलाव की तस्वीर है। एक तरफ 20 महिलाओं के हाथों का हुनर आज उनके लिए आजीविका की नई संभावना बना है, तो दूसरी तरफ सूरजपति ने 60 हजार रुपये के ऋण को मेहनत से व्यवसाय में बदलकर लगभग 1.80 लाख रुपये की वार्षिक आय तक का सफर तय किया है।
ये कहानियां बताती हैं कि महिला सशक्तिकरण का वास्तविक अर्थ केवल आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि महिलाओं को ऐसा अवसर देना है जिससे वे अपने हुनर और मेहनत के बल पर स्वयं की आजीविका खड़ी कर सकें।
बिहान से सरगुजा की ग्रामीण महिलाओं के जीवन में यही नई सुबह दिखाई दे रही है—जहां समूह से साथ मिल रहा है, प्रशिक्षण से हुनर निखर रहा है, आर्थिक सहयोग से स्वरोजगार खड़ा हो रहा है और मेहनत से महिलाएं आत्मनिर्भरता तथा सम्मान की नई पहचान बना रही हैं।




