Monday, July 27, 2026
Google search engine
Homeदेशजज पर आरोप लगाना पड़ा भारी! यूट्यूबर गुलशन पाहुजा को सुप्रीम कोर्ट...

जज पर आरोप लगाना पड़ा भारी! यूट्यूबर गुलशन पाहुजा को सुप्रीम कोर्ट ने सुनाई खरी-खरी

नई दिल्ली

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपालिका के खिलाफ बिना किसी ठोस सबूत के भ्रष्टाचार के आरोप लगाने पर सोमवार को कड़ी नाराजगी जताई. अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया के दौर में न्यायिक अधिकारियों पर लगाए गए बेबुनियाद आरोप उनके पूरे करियर को प्रभावित कर सकते हैं. शीर्ष अदालत ने साफ किया कि न्यायिक भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोप तथ्यों और सबूतों के आधार पर ही लगाए जाने चाहिए, न कि महज आरोपों के रूप में। 

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने यूट्यूबर गुलशन पाहुजा की याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की. पाहुजा ने दिल्ली हाई कोर्ट की तरफ से आपराधिक अवमानना के मामले में सुनाई गई छह महीने जेल की सजा को चुनौती दी है। 

‘याचिकाकर्ता की मंशा को लेकर सहानुभूति’
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यूट्यूबर से कहा, ‘आप बिना किसी सबूत के न्यायिक अधिकारियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं. क्या आपको पता है कि सोशल मीडिया पर ऐसे आरोपों का क्या असर होता है? इससे किसी न्यायिक अधिकारी की छवि धूमिल होती है और उसका पूरा करियर दांव पर लग सकता है. उन्हें ऐसे आरोपों का बोझ जीवनभर उठाना पड़ता है। 

हालांकि अदालत ने यह भी कहा कि उसे याचिकाकर्ता की मंशा को लेकर सहानुभूति है, लेकिन न्यायिक भ्रष्टाचार जैसे गंभीर आरोप बिना पर्याप्त साक्ष्यों के नहीं लगाए जा सकते. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गैरजिम्मेदाराना आरोप और प्रमाणित भ्रष्टाचार के आरोपों में बड़ा अंतर है। पाहुज ने किया सरेंडर
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि गुलशन पाहुजा दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश के बाद आत्मसमर्पण कर चुके हैं. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अब इस याचिका पर तत्काल सुनवाई का सवाल नहीं रह जाता और यह याचिका इस स्तर पर निष्प्रभावी हो गई है। 

अदालत ने यह भी कहा कि अगर सजा के निलंबन या अन्य राहत की मांग करनी है तो याचिकाकर्ता को दिल्ली हाई कोर्ट का रुख करना चाहिए। 

क्या है पूरा मामला?
दरअसल गुलशन पाहुजा ‘Fight 4 Judicial Reforms’ नाम से यूट्यूब चैनल चलाते हैं. आरोप है कि उन्होंने अपने चैनल पर अपलोड किए गए वीडियो में न्यायपालिका और कई न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ अपमानजनक और भ्रष्टाचार संबंधी टिप्पणियां की थीं. इसी मामले में तीन न्यायिक अधिकारियों ने दिल्ली हाई कोर्ट में आपराधिक अवमानना की याचिका दायर की थी। 

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि उनके चैनल पर दो वकीलों के इंटरव्यू प्रसारित किए गए थे, जिनमें न्यायपालिका को लेकर विवादित टिप्पणियां की गई थीं. बाद में दोनों वकीलों ने अदालत से बिना शर्त माफी मांग ली. उन्होंने कहा कि वीडियो को जिस रूप में प्रकाशित किया गया, उसकी उन्हें जानकारी नहीं थी. हाई कोर्ट ने उनकी माफी स्वीकार कर उनके खिलाफ कार्रवाई समाप्त कर दी। 

हालांकि, गुलशन पाहुजा ने अदालत में अपने बचाव में कहा कि उनका मकसद किसी जज को व्यक्तिगत रूप से निशाना बनाना नहीं था, बल्कि न्यायिक सुधारों की मांग उठाना था. इसके बावजूद दिल्ली हाई कोर्ट ने माना कि इस तरह की टिप्पणियां न्यायपालिका की गरिमा को ठेस पहुंचाती हैं और भविष्य में ऐसे मामलों पर रोक लगाने के लिए कड़ा संदेश देना जरूरी है. इसी आधार पर हाई कोर्ट ने उन्हें आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराते हुए छह महीने के कारावास की सजा सुनाई थी। 

सुप्रीम कोर्ट ने भी सुनवाई के दौरान दोहराया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका इस्तेमाल किसी न्यायिक अधिकारी पर बिना सबूत गंभीर आरोप लगाने के लिए नहीं किया जा सकता. अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया के दौर में ऐसे आरोपों के दूरगामी और गंभीर परिणाम हो सकते हैं। 

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments