Monday, July 27, 2026
Google search engine
Homeराज्यउत्तर प्रदेशकांवड़ यात्रा: एकता का महासंगम, विभाजन की राजनीति पर जवाब!

कांवड़ यात्रा: एकता का महासंगम, विभाजन की राजनीति पर जवाब!

लखनऊ 

हमारे मनीषियों ने पूर्व में ही कहा है कि ‘संघे शक्ति कलियुगे’। अर्थात वर्तमान युग में सबसे बड़ी शक्ति संगठन और सामूहिकता की है। हमारी सनातन सांस्कृतिक चेतना का यही मूल स्वर रहा है कि आस्था केवल पूजा-पद्धति नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाला सेतु है। कांवड़ यात्रा इसी सूत्र वाक्य का जीवंत प्रमाण बनकर प्रतिवर्ष श्रावण मास में साकार होती है, जब लाखों-करोड़ों शिवभक्त कंधे पर गंगाजल लेकर मीलों की पदयात्रा करते हैं और सामाजिक भेद-भाव की समस्त दीवारें ढहा देते हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कांवड़ यात्रा को अपनी सामाजिक प्राथमिकताओं में शामिल करते हुए इसी चेतना को स्वर दिया और इसे राजकीय गरिमा और उत्सव के रूप में स्थापित किया। कांवड़ यात्रा से उठनेवाली गूंज वस्तुतः हमारी सनातन एकता का उद्घोष है, जो पूरे समाज को शक्ति प्रदान करता है।

सनातन का वास्तविक रूप
कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, यह सनातन धर्म की उस अंतर्निहित शक्ति का प्रकटीकरण है जो जाति, वर्ग और सामाजिक स्थिति के भेद को मिटाकर सबको एक समान पंक्ति में खड़ा कर देती है। जब कोई श्रद्धालु कंधे पर कांवड़ लेकर चलता है, तो न तो उससे यह पूछा जाता है कि वह किस जाति का है, न ही यह देखा जाता है कि वह किस आर्थिक पृष्ठभूमि से आता है। रास्ते में जो शिविर लगते हैं, वहां दलित, पिछड़ा, अगड़ा, सभी वर्गों के लोग समान भाव से सेवा में जुटते हैं, साथ ही प्रसाद ग्रहण करते हैं। यही सनातन धर्म का वास्तविक रूप है। एक ऐसा धर्म जो विभाजन नहीं, संगठन सिखाता है।

तुष्टिकरण के तहत लगाया प्रतिबंध
यह विडंबना ही है कि पूर्व सरकारों ने इस गरिमामयी यात्रा में भी राजनीतिक तुष्टिकरण के तत्व देखे और इस सांस्कृतिक एकता को खंडित करने का प्रयत्न किया। समाजवादी पार्टी की सरकार में इस यात्रा पर प्रतिबंध तुष्टिकरण की राजनीति का ही आधार था। यह समाजवादी पार्टी की उस मानसिकता का प्रतिबिंब था, जो बहुसंख्यक समाज की आस्था को असुविधाजनक मानती थी। जब सत्ता ऐसे निर्णय लेती है, तो वह केवल एक यात्रा को नहीं रोकती, वह करोड़ों श्रद्धालुओं की सामूहिक भावना को आघात पहुंचाती है। इसके विपरीत योगी सरकार ने कांवड़ यात्रा को न केवल पुनर्स्थापित किया, बल्कि उसे जनभावनाओं से जोड़ा। कोई सरकार जब कांवड़ मार्गों पर पुष्प वर्षा, स्वच्छता व्यवस्था, चिकित्सा शिविर, सुरक्षा प्रबंध को सुनियोजित रूप देती है तो वह अपनी प्राथमिकता को स्पष्ट करती है। कांवड़ मार्ग पर एलईडी लाइटों का प्रकाश ऐसा प्रतीत होता है, जैसे पूरा प्रदेश दीपावली मना रहा हो। प्रशासन द्वारा जगह-जगह विश्राम शिविर, चिकित्सा शिविर और शीतल जल की व्यवस्था के साथ चिकित्सकों की टीमें चौबीसों घंटे तैनात रहती हैं, ताकि किसी भी श्रद्धालु को स्वास्थ्य संबंधी असुविधा न झेलनी पड़े। जब प्रशासन स्वयं श्रद्धालुओं के स्वागत में खड़ा होता है और पुलिस के जवान कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा करते हैं, तो राज्य और समाज का अटूट संबंध सांस्कृतिक गौरव के रूप में स्थापित होता है।

आस्था के सम्मान का पर्व 
इतने बड़े जन समागम में सुरक्षा व्यवस्था अत्यंत महत्वपूर्ण है। ड्रोन कैमरों से निगरानी, हजारों की संख्या में पुलिसकर्मियों की तैनाती, महिला श्रद्धालुओं के लिए विशेष सुरक्षा घेरे, और संवेदनशील स्थानों पर अतिरिक्त सतर्कता, यह सब इस बात का प्रमाण है कि सरकार ने आस्था की रक्षा को अपना कर्तव्य माना है। हेलीकॉप्टर से पुष्प वर्षा की परंपरा भी अब इस यात्रा की पहचान बन चुकी है। जब आकाश से फूलों की बारिश होती है और नीचे लाखों कंधों पर कांवड़ें डोलती हैं, तो यह दृश्य अद्भुत होता है। वस्तुतः यह राज्य की ओर से करोड़ों श्रद्धालुओं के प्रति कृतज्ञता और सम्मान का सार्वजनिक उद्घोष है। मार्ग में स्थापित विशाल स्वागत द्वार, सांस्कृतिक मंच, भजन-संध्याएं, और स्थान-स्थान पर बजते शिव भजन इस यात्रा को एक सामूहिक आध्यात्मिक अनुभव में बदल देते हैं, जहां थकान भी भक्ति में विलीन हो जाती है।

यात्रा का सम्मान एक संदेश
योगी सरकार ने कांवड़ यात्रा को भव्यता दी है तो इसके पीछे एक गहरी सामाजिक दृष्टि है। जब सरकार इस यात्रा का सम्मान करती है, तो समाज के प्रत्येक वर्ग को यह संदेश जाता है कि उनकी आस्था को राजकीय संरक्षण प्राप्त है। यह भावना विशेष रूप से उन वर्गों के लिए महत्वपूर्ण है, जो सदियों से हाशिये पर रहे और जिन्हें अपनी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति के लिए संघर्ष करना पड़ा। समाज के आखिरी पायदान पर खड़ा व्यक्ति जब पूरे उत्साह के साथ कांवड़ यात्रा में शामिल होता है और उसे राह में हर जगह सम्मान प्राप्त होता है तो वह स्वयं को राज्य की प्राथमिकता सूची में अनुभव करता है। यही अनुभूति सच्ची सामाजिक समरसता की नींव रखती है।

 सामाजिक क्रांति का परिचायक
कांवड़ यात्रा के मार्ग में स्थापित सेवा शिविरों की परंपरा भी सामाजिक समरसता का उत्कृष्ट उदाहरण है। इन शिविरों में सेवा करने वाले स्वयंसेवक जात-पात का भेद किए बिना श्रद्धालुओं की सेवा में जुटे रहते हैं, और अब इन शिविरों को प्रशासनिक सहयोग भी प्राप्त होता है, जिससे इनकी क्षमता और गुणवत्ता कई गुना बढ़ गई है। यह ‘सेवा परमो धर्मः’ के सिद्धांत का व्यावहारिक क्रियान्वयन है, जिसे अब राजकीय संबल भी प्राप्त है। आज के युवा वर्ग में, विशेषकर दलित और अन्य पिछड़ा वर्ग के नौजवानों में, कांवड़ यात्रा के प्रति जो उत्साह देखा जा रहा है कि वह इस बात का प्रमाण है कि सनातन धर्म की जड़ें कितनी मजबूत हैं। जब एक दलित युवक और एक सवर्ण युवक कंधे से कंधा मिलाकर, एक ही रंग के वस्त्र पहनकर, एक ही मार्ग पर, एक ही उद्देश्य से चलते हैं, तो यह दृश्य एक ऐसी सामाजिक क्रांति का परिचायक है, अनेकता में एकता का प्रतीक है। यह समरसता समाजशास्त्रियों, सेमिनारों से नहीं आ सकती, लेकिन सनातन आस्था इसे सहजता से घटित कर देती है।

कांवड़ यात्रा जैसे पर्व और उनकी यह भव्य राजकीय व्यवस्था हमें यह स्मरण कराती है कि सच्चा शासन वही है जो अपने समाज की आस्था के साथ खड़ा होता है, न कि उससे दूरी बनाकर। जो सरकार श्रद्धालु के पांवों में छाले पड़ने पर मरहम लगाती है, जो सरकार आधी रात को भी शिविरों में जागकर सेवा देती है, वह केवल एक धार्मिक आयोजन का प्रबंधन नहीं करती, वह करोड़ों दिलों में विश्वास का संचार करती है। कांवड़ यात्रा हमें यह स्मरण कराती है कि सनातन धर्म की भव्यता उसकी समावेशिता में है, और जब यह भव्यता राजकीय संरक्षण और सम्मान से जुड़ जाती है, तो वह और अधिक प्रकाशमान हो उठती है। यही सनातन धर्म की सबसे बड़ी विजय है कि वह हर युग में, हर परिस्थिति में, चाहे विरोध हो या समर्थन, एकता और सेवा का संदेश देता रहता है। कांवड़ यात्रा इसी शाश्वत संदेश की जीवंत अभिव्यक्ति है, जो प्रतिवर्ष श्रावण मास में हमें पुनः स्मरण कराती है कि हम सब, चाहे किसी भी जाति, वर्ग या स्थिति के हों, अंततः एक ही सनातन परंपरा की संतान हैं।

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments