Thursday, September 10, 2026
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चीन-अमेरिका को टक्कर देता भारत का DFC, 2,843 किमी का फ्रेट नेटवर्क पूरा; जानिए कैसे बदल जाएगी आपकी जिंदगी

नई दिल्ली 

सौ बात की एक बात ये कि खबरों की भीड़ में जो रेल की लेटेस्ट खबर आई है उसपर ध्यान पब्लिक का शायद उतना नहीं जा रहा क्योंकि बात मालगाड़ी की है, लेकिन उसको समझने की जरूरत है कि बात सिर्फ मालगाड़ी की नहीं है. ये सब के मतलब की खबर है. वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर, इसके आखिरी तीन हिस्सों का भी उद्घाटन कर दिया गया. डेडिकेटेड मतलब सिर्फ फ्रेट के लिये, माल के लिए. मतलब सिर्फ मालगाड़ियों के लिए अलग रेल की पटरी. जिसपर सिर्फ मालगाड़ियां चलेंगी. इसके आखिरी तीन हिस्से यानी कुल 326 km के हिस्से का भी अब उद्घाटन हो गया. यानी पूरा 2,843 किलोमीटर का डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर नेटवर्क अब पूरी तरह चालू हो गया है. तो ये सिर्फ मालगाड़ियों की बात इसलिए नहीं है क्योंकि इसका फायदा तो सबको मिलेगा. मालगाड़ी के चक्कर में किसकी ट्रेन लेट नहीं हुई जीवन में? ये वाली प्रॉब्लम तो सब झेल चुके हैं. पहले एक ही पटरी पर यात्री ट्रेनें और मालगाड़ियां दोनों चलती थीं. मालगाड़ियां भारी और धीमी होती हैं, इसलिए यात्री ट्रेनों को बार-बार रुकना पड़ता था या लेट होना पड़ता था. पटरियां जैम रहती थीं. अब मालगाड़ियों का बड़ा हिस्सा डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर चला गया है. पुरानी लाइनों पर जगह खाली हुई है. रेलवे अब उन लाइनों पर ज्यादा यात्री ट्रेनें चला सकता है और वो टाइम पर चलेंगी ये भी उम्मीद बढ़ जाती है।

20 साल पहले बना प्लैन

क्योंकि ये डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर सिर्फ मालगाड़ियों के लिए बनी हुई एकदम अलग रेल लाइन है. इसलिए मालगाड़ियां बिना रुके तेज दौड़ सकती हैं. और ये काम चल रहा था 2005 से. 20 साल पहले से. 2005 में प्लैन बना. 2006 में इसके लिए DFCCIL नाम से अलग कंपनी बनाई गई इसे बनाने और चलाने का काम संभालने के लिए. जापान की मदद से वेस्टर्न कॉरिडोर और विश्व बैंक की मदद से ईस्टर्न कॉरिडोर का काम शुरू हुआ. जमीन लेने में दिक्कतें आईं, ठेके देने में कई अड़चनें आईं, निर्माण में कई बाधाएं आईं. तो काम जरूर लंबा खिंचा. ईस्टर्न कॉरिडोर 2023-24 में पूरा हुआ और वेस्टर्न का आखिरी हिस्सा अब जाकर 2026 में पूरा हुआ है।

ये कॉरिडोर दो बड़े हिस्सों में बंटा है. एक है ईस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर जो पंजाब के लुधियाना से बिहार के सोननगर तक 1,337 किलोमीटर लंबा है. ये मुख्य रूप से कोयला, स्टील, अनाज जैसे भारी माल के लिए है. दूसरा है वेस्टर्न डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर जो उत्तर प्रदेश के दादरी से मुंबई के जवाहरलाल नेहरू पोर्ट तक 1,506 किलोमीटर लंबा है. ये कंटेनर माल और इंपोर्ट-एक्सपोर्ट के लिए है खासतौर पर. दादरी पर दोनों कॉरिडॉर मिलते हैं और पूरे उत्तर, पश्चिम और पूर्व को जोड़ देते हैं. लेकिन खबर में जो खासतौर पर समझने की बात है वो ये कि ये दुनिया में अनोखा है. क्यों? क्या दुनिया में मालगाड़ियां नहीं चलतीं? बिल्कुल चलती हैं. लेकिन इसमें डबल स्टैक मालगाड़ी चल सकती है।

डबल स्टैक का मतलब

डबल स्टैक मतलब एक डिब्बे के ऊपर दूसरा डिब्बा, एक कंटेनर के ऊपर दूसरा कंटेनर. वैसे तो अमेरिका जैसे देशों में डबल स्टैक कंटेनर ट्रेनें चलती हैं यानी एक डिब्बे पर दो कंटेनर एक के ऊपर एक रखे जाते हैं, लेकिन वहां ऐसी मालगाड़ी चलती है डीजल इंजन से. अब आप कहोगे तो ये कौनसा बड़ा फर्क हो गया? तो वो समझने वाली बात है कि भारत ने जो बनायी है पटरी उसपर ये इलेक्ट्रिक गाड़ी चलेगी. और इलेट्रिक इंजन की पटरी पर एक के ऊपर एक कंटेनर रख कर चलाओ तो बिजली की तारें भी तो फंस जाएंगी. इसलिए ये भारत में पटरी बनी है वो दुनिया में अनोखी बनाई गई है. इसकी तारें उतनी ऊचीं लगाई गई हैं कि गाड़ी डबल कंटेनर ले कर चल सके. पैसेंजर गाड़ियों वाली पटरी पर डबल कंटेनर लेकर नहीं जा सकते क्योंकि बिजली की तारें आ जती हैं बीच में. भारत ने पूरे कॉरिडोर पर बिजली की तारें ऊंची लगाई हैं, लगभग 7.5 मीटर ऊंची. इससे बिजली के इंजन से डबल स्टैक ट्रेनें चल सकती हैं. ऐसा पूरा फ्रेट कॉरिडोर, ऐसी पूरी रेल लाइन ही ऊंची तारों की हो, ये दुनिया के किसी और देश में नहीं है. और क्योंकि पूरी लाइन है ही मालगाड़ियों के लिए, तो ट्रेन की लंबाई भी डबल रख सकते हैं।

डबल लंबाई और डबल ऊंचाई

लॉन्ग हॉल यानी लंबी दूरी तक माल ढोने के लिए ट्रेन में डिब्बे भी ज्यादा लगाते हैं. तो डबल लंबाई और डबल ऊंचाई, तो एक ट्रेन अब चार सामान्य ट्रेनों जितना माल ले जा सकती है. स्पीड भी 100 km/h तक हो सकती है क्योंकि पूरी लाइन ही मालगाड़ी की है. पैसेंजर ट्रेनों के लिए रुकना ही नहीं है. पुरानी लाइनों पर मालगाड़ियां औसतन 25 km/h ही चल पाती थीं. ट्रक से जिस माल को पहुंचने में 30 घंटे लगते हैं, वही माल अब इससे 10-12 घंटे में पहुंच जाता है. तो फायदा हर लेवल पर है. आप ये देखो कि पहले लॉजिस्टिक्स यानी माल ढोने का खर्च देश की जीडीपी का लगभग 14% था, जो बाकी देशों से बहुत ज्यादा था।

यानी हमारे यहां ज्यादातर सामान की कीमत का बड़ा हिस्सा तो उसकी ढुलाई के खर्चे का होता था. अब ये घटकर 8-9 % के आसपास आ रहा है. माल सस्ता भी पहुंचता है और जल्दी भी पहुंचता है. किसानों का अनाज हो, फैक्टरियों का माल हो, कच्चा माल हो, तैयार सामान हो, सब में फायदा है. और लोगों को रेल का सीधा फायदा तो ये कि पुरानी रेल लाइनों से मालगाड़ियां हटने से बाक़ी यात्री ट्रेनें ज्यादा चलाई जा सकती हैं और टाइम पर चल सकती हैं. क्योंकि ये भी प्रॉब्लम खड़ी हो गई थी कि दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-हावड़ा जैसे व्यस्त रूट पर यात्री बढ़े जा रहे हैं और वो वंदे भारत जैसी ट्रेनों के लिए पैसा देने को भी तैयार दिख रहे हैं लेकिन पटरियां ही इतनी नहीं थीं कि और ट्रेनें चला सकें. तो पटरियां तो और बिछाने की जरूरत थी है. यानी जितनी ट्रेनें चल सकती थीं उससे कहीं ज्यादा ट्रेनें दौड़ रही थीं पहले ही पटरियों पर इन रूट पर. इस वजह से नई यात्री ट्रेनें शुरू करना मुश्किल हो जाता था. जगह ही नहीं बचती थी. मालगाड़ियां और यात्री ट्रेनें एक ही पटरी पर दौड़ने के लिए आपस में लड़ती रहती थीं. यात्री ट्रेनों को निकलने का रास्ता दो तो मालगाड़ियां और धीमी हो जाती थीं, और भीड़ और बढ़ जाती थी।

नई यात्री ट्रेनें चलाना मकसद

तो डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर का एक बड़ा मकसद यही था कि मालगाड़ियों का बड़ा हिस्सा इन नई लाइनों पर चला जाए, ताकि पुरानी लाइनों पर जगह खाली हो और नई यात्री ट्रेनें चलाई जा सकें और भीड़ कम की जा सके. अब ये फायदा दिखने लगेगा ये उम्मीद है. और बिजली से चलने वाली ये ट्रेनें प्रदूषण भी कम करती हैं. रोज 440 से ज्यादा मालगाड़ियां अब इन लाइनों पर दौड़ रही हैं. भारत अब रेल से माल ढुलाई में चीन के बाद दुनिया का नंबर दो देश बन गया है. अमेरिका के पास भी बहुत बड़ा रेल नेटवर्क तो है लेकिन वहां ज्यादातर निजी कंपनियां हैं रेलवे की और वो डीजल इंजन से माल ढोती हैं. चीन के पास और भी लंबी फ्रेट लाइनें जरूर हैं लेकिन इस तरह का पूरा बिजली वाला डबल स्टैक वाला कॉरिडोर इतने बड़े पैमाने पर चीन के पास भी नहीं है।

भारत ने ये नया ट्रैक बिछाकर, ऊंची तारें लगाकर, और भारी ट्रेनें चलाकर एक नई मिसाल कायम की है. ये दिल्ली-मुंबई इंडस्ट्रियल कॉरिडोर जैसी योजनाओं को भी ताकत देता है. आगे और कॉरिडोर बनाने की योजना है. यानी ये सिर्फ रेल लाइन नहीं है, ये देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन रही है. ये पूरा सायकल है. माल तेज पहुंचेगा तो कारखाने बढ़ने की उम्मीद है, कारखाने बढ़ेंगे तो नौकरियां बढ़ने की उम्मीद है, निर्यात बढ़ने की उम्मीद है. मतलब कुल मिलाकर मकसद ये है कि भारत विश्व व्यापार में और मजबूत होकर उभरे. क्योंकि सबसे बड़ी लड़ाई तो मैन्युफैक्चरिंग बढ़ाने की है, कारखाने बढ़ाने की है. और उसके लिए जो सब कुछ करना है उसमें मालढुलाई एक बहुत अहम हिस्सा है. इसलिए ये नहीं समझना चाहिए कि हमारा इससे क्या लेना-देना. ये को उद्योग धंधे वालों की खबर है. नहीं, ये सब के मतलब की खबर है. गाड़ी सबकी पटरी पर आनी चाहिए. सौ बात की एक बात।

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