Tuesday, October 13, 2026
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करनाल के किसानों के लिए जरूरी सलाह, सही बीज और समय पर बुआई से बढ़ेगा आलू का उत्पादन

 करनाल
 धान की कटाई के बाद खेतों को अगली फसल के लिए तैयार कर रहे किसानों के लिए आलू की खेती आमदनी बढ़ाने का विकल्प बन सकती है।

अक्टूबर का महीना आलू की बुआई के लिहाज से महत्वपूर्ण है। सही किस्म का चयन, प्रमाणित बीज, खेत की तैयारी, संतुलित खाद और पानी का प्रबंधन भी फसल की सफलता तय करते हैं। किसानों को चाहिए कि वे अपने क्षेत्र की जलवायु, मिट्टी और फसल की अवधि के अनुसार किस्म चुनें तथा कृषि विशेषज्ञों की सलाह से बुआई करें।

34 हजार हेक्टेयर में 8,16,000 एमटी उत्पादन का लक्ष्य
बागवानी विभाग के मुताबिक इस बार 34 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में खेती और 8,16,000 मीट्रिक टन उत्पादन का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। ये आंकड़े बताते हैं कि आलू प्रदेश की सब्जी उत्पादन व्यवस्था में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

मैदानी क्षेत्रों में 25 अक्टूबर तक की जा सकती है बुआई
मैदानी क्षेत्रों में आलू की अगेती बुआई के लिए अक्टूबर का मध्य से अंतिम सप्ताह महत्वपूर्ण माना जाता है। सामान्य कृषि सलाह के अनुसार 10 से 25 अक्टूबर के बीच बुआई की जा सकती है।

पछेती बुआई के लिए नवंबर के पहले पखवाड़े तक का समय उपयोगी हो सकता है, लेकिन किस्म, क्षेत्र और मौसम के अनुसार समय में बदलाव जरूरी है। करनाल और आसपास के किसानों को खेत में पर्याप्त नमी, मिट्टी के तापमान और मौसम के पूर्वानुमान को ध्यान में रखकर निर्णय लेना चाहिए।

कौन-सी किस्में चुनें
आलू की किस्म का चयन उत्पादन व बाजार की मांग को ध्यान में रखकर करना चाहिए। प्रदेश में कुफरी ज्योति, कुफरी पुखराज, कुफरी बहार और कुफरी चंद्रमुखी जैसी किस्मों पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, किस्मों की अवधि, रोगों के प्रति संवेदनशीलता, कंद का आकार और बाजार में उपयोग अलग-अलग हो सकता है।

ऐसे करें बुआई, तभी मिलेगा बेहतर उत्पादन
आलू की अच्छी फसल के लिए खेत की तैयारी पर विशेष ध्यान देना जरूरी है। खेत की मिट्टी भुरभुरी और जल निकासी वाली होनी चाहिए। खेत में पानी रुकने से कंद सड़ने और रोग लगने का खतरा बढ़ सकता है। बुआई के लिए स्वस्थ, रोगमुक्त और प्रमाणित बीज का इस्तेमाल करें।

आलू का फसल में पछेती झुलसा जैसे रोग नुकसान पहुंचा सकते हैं। बिना रोग की पहचान के कीटनाशक या फफूंदनाशक का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। प्रमाणित बीज, सही बुआई समय, मिट्टी की जांच और संतुलित पोषण से बेहतर मुनाफे की संभावना बढ़ाई जा सकती है। – डा. मनोज भानुकर, डिप्टी डायरेक्टर आलू प्रौद्योगिकी संस्थान करनाल।

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