Thursday, July 30, 2026
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ऐतिहासिक सच: स्वतंत्रता नहीं, खलीफा के हिमायती थे जौहर-डॉ. कौस्तुभ आर्यवंशी

रामपुर

भय एवं भ्रष्टाचार की नींव पर रामपुर में खड़ी की गई जौहर विश्वविद्यालय की इमारत का नामकरण भी इतिहास की उस गलती को सम्मानित करने जैसा है, जिसने देश का भूगोल बदल दिया। नौजवान पीढ़ी में बहुत कम लोगों को ही यह जानकारी होगी कि मौलाना मोहम्मद अली जौहर, जिनके नाम पर यह विश्वविद्यालय बनाया गया, जिन्हें इतिहास की किताबों में महान स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, कवि और शिक्षाविद बताया गया, ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में तुर्की के खिलाफत आंदोलन को शामिल कर देश के विभाजन की नींव रख दी थी।

10 दिसंबर 1878 को रामपुर, उत्तर प्रदेश में जन्मे मौलाना जौहर और उनके भाई मौलाना शौकत अली (अली बंधु) की खिलाफत आंदोलन और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में भूमिका कई सवालों को जन्म देती है। स्वतंत्रता संग्राम जब अपने चरम पर था, खिलाफत आंदोलन को असहयोग आंदोलन के साथ जोड़ दिया गया और इसका मुख्य उद्देश्य हिंदू-मुस्लिम एकता को मजबूत करना और ब्रिटिश सरकार पर दबाव बनाना बताया गया। हालांकि, ऐतिहासिक तथ्य स्पष्ट करते हैं कि इस धार्मिक आंदोलन को राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम के साथ मिलाने से देश और स्वतंत्रता आंदोलन को गंभीर और दूरगामी नुकसान उठाने पड़े।

राष्ट्रीय राजनीति में धर्म की घुसपैठ

यह आंदोलन वर्ष 1919-1924 के दौरान भारत में चलाया गया था। प्रथम विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों ने तुर्की के सुल्तान (खलीफा) की सत्ता और उसके साम्राज्य को कमजोर कर दिया था। दुनिया भर के मुसलमानों की तरह भारतीय मुसलमान भी खलीफा के पद को बचाए रखना चाहते थे। मौलाना मोहम्मद अली जौहर और उनके भाई मौलाना शौकत अली इसी खिलाफत आंदोलन को भारत ले आए और इसकी अगुवाई करने लगे। जबकि, यह सर्वविदित है कि खिलाफत आंदोलन का मूल उद्देश्य तुर्की के खलीफा (इस्लाम के आध्यात्मिक प्रमुख) के पद और साम्राज्य की रक्षा करना था, जो कि विशुद्ध रूप से एक धार्मिक और अंतरराष्ट्रीय मुस्लिम मुद्दा था। जब इस धार्मिक मुद्दे को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के केंद्र में लाया गया, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान भारतीय राजनीति में धर्म की गहरी घुसपैठ के रूप में सामने आया। इससे स्वतंत्रता आंदोलन, जो अब तक अधिक से अधिक धर्मनिरपेक्ष और राष्ट्रीय मुद्दों (जैसे रौलट एक्ट, नमक एक्ट, जलियांवाला बाग हत्याकांड और स्वराज) पर केंद्रित था, धार्मिक पहचानों में बंटने लगा।

तुष्टीकरण की राजनीति की शुरुआत

महात्मा गांधी तथा कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने खिलाफत आंदोलन का खुलकर समर्थन किया ताकि भारतीय मुसलमान राष्ट्रीय आंदोलन की मुख्यधारा में शामिल हो सकें, लेकिन इसके दीर्घकालिक परिणाम विवादास्पद रहे। इससे भारतीय राजनीति में विशेषकर कांग्रेस पार्टी में 'तुष्टीकरण' की संस्कृति को बढ़ावा मिला। राजनीतिक लाभ के लिए धार्मिक मुद्दों को राष्ट्रीय मंच पर प्रमुखता देने की जो परंपरा इस दौरान पड़ी, उसने आगे चलकर देश की राजनीति को प्रभावित किया। कांग्रेस में मुस्लिम तुष्टीकरण के बीज इतने गहरे समा गए कि आज तक पार्टी इससे बाहर नहीं निकल सकी। कालांतर में क्षेत्रीय दलों खासतौर से समाजवादी पार्टी व राष्ट्रीय जनता दल ने राजनीतिक लाभ के लिए इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए कांग्रेस से मुस्लिम वोटबैंक हथिया लिया।

मोपला विद्रोह और सांप्रदायिक हिंसा
खिलाफत आंदोलन के दौरान जब उत्तेजना बढ़ी, तो इसके कई क्षेत्रीय और हिंसक परिणाम सामने आए, जिनका राष्ट्रवाद पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। केरल में 1921 का मोपला विद्रोह इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जो मूल रूप से खिलाफत और किसान आंदोलन के रूप में शुरू हुआ था, लेकिन जल्द ही यह हिंसक सांप्रदायिक दंगों में बदल गया, जिसमें हिंदुओं को निशाना बनाया गया। इस घटना ने दोनों समुदायों के बीच अविश्वास की एक गहरी खाई पैदा कर दी।

असहयोग आंदोलन में भटकाव और अंत

खिलाफत और असहयोग आंदोलन को एक कर दिए जाने से आंदोलन का ध्यान पूरी तरह से ब्रिटिश शासन के खिलाफ स्वतंत्रता प्राप्त करने से हटकर तुर्की के खलीफा की बहाली पर केंद्रित हो गया। जब 1922 में चौरी-चौरा कांड के बाद गांधीजी ने असहयोग आंदोलन वापस लिया, तो भारत में खिलाफत आंदोलन भी कमजोर पड़ने लगा। हालांकि 1924 में खुद तुर्की के आधुनिक नेता मुस्तफा कमाल पाशा ने तुर्की में खलीफा का पद ही समाप्त कर दिया। नतीजा यह कि जिस ‘बड़े उद्देश्य’ के लिए भारतीय मुसलमानों को मोर्चे पर लाया गया था, वह उद्देश्य तुर्की में ही दम तोड़ गया। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को खिलाफत मूवमेंट से कोई कूटनीतिक या राजनीतिक लाभ नहीं मिला, सिवाय इसके कि हिंदू व मुसलमानों के बीच नफरत की एक गहरी खाई जन्म ले चुकी थी।

अंततः देश का विभाजन

खिलाफत आंदोलन का उद्देश्य कभी भी भारत की आज़ादी नहीं, बल्कि तुर्की के खलीफा के पद की रक्षा करना था। इसीलिए कई इतिहासकारों का मानना था कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को किसी दूसरे देश के धार्मिक-राजनीतिक मुद्दे से जोड़ना एक गंभीर चूक थी। आजादी के आंदोलन के दौरान मुसलमानों के सर्वमान्य नेता बनने में जुटे मोहम्मद अली जिन्ना के प्रयासों को खिलाफत आंदोलन से बड़ा झटका लगा था। इसीलिए उन्होंने गांधी जी के फैसले की आलोचना की। मतभेद इतने बढ़े कि जिन्ना कांग्रेस से दूर होकर अपनी अलग जमीन तैयार करने लगे। इसके बाद उपजे राजनीतिक घटनाक्रम ने भारत के सांप्रदायिक ताने-बाने को जो क्षति पहुंचाई, उसने अंततः द्वि-राष्ट्र सिद्धांत और देश के विभाजन की जमीन तैयार कर दी।

जौहर के नाम पर विश्वविद्यालय क्यों?

जब इतिहास के पन्ने एक गलत फैसले की गवाही दे रहे हों, यह सवाल लाजिमी हो जाता है कि सिर्फ मुस्लिम होने की वजह एक विदेशी आंदोलन को भारत पर थोपने वाले मौलाना जौहर के नाम पर रामपुर में विश्वविद्यालय बनाना कितना उचित था? जवाब सपा नेता आज़म खान की कट्टरपंथी सोच के सिवा कुछ नहीं। अगर ऐसा नहीं होता तो वह विश्वविद्यालय के नामकरण के समय अबुल कलाम आजाद, शहीद अब्दुल हमीद या पूर्व राष्ट्रपति भारत रत्न डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर जरूर विचार करते।

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