लखनऊ
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने शनिवार को लखनऊ में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन 'टेक संगम 2026' में अपने संबोधन में टीवी सीरियल सीआईडी का जिक्र करते हुए कहा कि आपने देखा होगा कि अपराधी कितना भी शातिर हो, एक बाल, फिंगरप्रिंट या छोटे से सुराग से पुलिस उस तक पहुंच जाती है। अब यही रील लाइफ उत्तर प्रदेश में रियल लाइफ बन रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) और डीपफेक के दौर में अपराधी तकनीक का कितना भी पर्दा ओढ़ लें, वैज्ञानिक साक्ष्य और फॉरेंसिक जांच के सहारे कानून के शिकंजे से बच नहीं पाएंगे।
यूपी स्टेट इंस्टीट्यूट ऑफ फॉरेंसिक साइंस (यूपीएसआईएफएस) में आयोजित तीन दिवसीय सम्मेलन में मुख्यमंत्री ने कहा कि एआई मददगार हो सकता है, लेकिन उसे निर्णायक नहीं बनने देना चाहिए। तकनीक का संचालन मानव विवेक से होना चाहिए। पूरी तरह एआई पर निर्भरता भविष्य में संकट पैदा कर सकती है। वैज्ञानिक साक्ष्यों, आधुनिक तकनीक और विधिक प्रक्रिया के समन्वय से अपराधियों तक पहुंचने के साथ न्याय मिलने में होने वाली देरी भी कम की जा सकती है।
एक बाल और फिंगरप्रिंट से खुलेंगे अपराध के राज
सीएम योगी ने लोकप्रिय टीवी सीरियल CID का उदाहरण देते हुए कहा कि पहले लोग टेलीविजन पर देखते थे कि पुलिस बाल या फिंगरप्रिंट के आधार पर अपराधी तक कैसे पहुंचती है। आज फॉरेंसिक विज्ञान की मदद से ऐसी जांच वास्तविक जीवन में संभव हो रही है। डीपफेक और डिजिटल हेरफेर के दौर में भी वैज्ञानिक साक्ष्य अपराध की गुत्थी सुलझाने में अहम भूमिका निभाएंगे। उन्होंने एक माफिया का उदाहरण दिया, जिसने 1980 में पहला अपराध किया था, लेकिन साक्ष्यों के अभाव और डीएनए सैंपल नष्ट होने के कारण उसे 2022 में, यानी 42 साल बाद सजा मिल सकी। यह मामला बताता है कि समय पर वैज्ञानिक साक्ष्य जुटाना कितना जरूरी है।
हर पुलिस रेंज में फॉरेंसिक लैब
मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रदेश की सभी 18 पुलिस रेंजों में फॉरेंसिक लैब विकसित की जा रही हैं। इनमें 12 तैयार हो चुकी हैं, जबकि छह अंतिम चरण में हैं। इसके अलावा 150 से अधिक फॉरेंसिक वैन तैनात की गई हैं। इनसे घटनास्थल पर साक्ष्य जुटाने और विवेचना को मजबूत बनाने में मदद मिलेगी। कार्यक्रम में योगी ने 'LEXQ सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' का शुभारंभ किया, कंसेंट मैनेजमेंट पोर्टल लॉन्च किया और 'अभेद्य' परियोजना की आधारशिला रखी। उन्होंने कहा कि कानून और विज्ञान का समन्वय न्याय व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाएगा।
अपराध की जांच में वैज्ञानिक सबूत अहम
न्याय मिलने में देरी का उल्लेख करते हुए सीएम योगी ने एक माफिया के मामले का जिक्र किया, जिसने वर्ष 1980 में पहला अपराध किया था, लेकिन साक्ष्यों के अभाव और डीएनए सैंपल नष्ट होने के कारण उसे वर्ष 2022 में, यानी 42 साल बाद सजा मिल सकी। यह उदाहरण बताता है कि अपराध की जांच में वैज्ञानिक साक्ष्य कितने महत्त्वपूर्ण हैं और समय पर साक्ष्य जुटाना न्याय प्रक्रिया के लिए क्यों जरूरी है।




