Sunday, August 16, 2026
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विदेशी फंडिंग पर FCRA की सख्ती सही, मगर धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं को लेकर संशय

 पटना
नेशनल यूथ अवार्डी और प्रहरी के अध्यक्ष वीरेंद्र कुमार शर्मा ने FCRA कानून के बारे में सभी उलझनों को सरलता से समझाया। उन्होंने कहा कि एफसीआरए (विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम) के सदुपयोग और दुरुपयोग को लेकर प्रश्न इसके शुरुआती काल से ही उठाए जाते रहे हैं।

हर दौर की सरकार अकुंश के लिए समय-समय पर अधिनियम में संशोधन कर सख्ती व पारदर्शिता के मानक को बढ़ाती रही है। वर्तमान सरकार की मंशा और संशोधित अधिनियम के कुछ मानकों पर हम भले सवाल खड़े कर लें, लेकिन इससे जुड़ा कोई भी व्यक्ति ईमानदारी पूर्वक दावा नहीं कर सकता है कि विदेशों से प्राप्त राशि का कुछ संस्था व व्यक्ति दुरुपयोग नहीं करते हैं।

सवाल यह है कि क्या किसी संप्रभु राष्ट्र की सरकार को यह अधिकार नहीं है कि घर में बैठे भेदियों को बाहर से मिल रहे हवा-पानी की पाइप को ब्लॉक कर सके। स्वाभाविक है कि जवाब हां में ही होगा।

अपने देश की खूबसूरती और पहचान हमारी सांस्कृतिक, धार्मिक और भौगोलिक विविधता में समाहित है। इसमें सेंध को बर्दाश्त किया जाना चाहिए?

उन्होंने कहा कि इस विशाल राष्ट्र के डीएनए में ही सहचर का भाव है। लेकिन, समय-समय पर ऐसी घटनाएं हो जाती हैं, जिससे आभास होता है कि कुछ तत्व हैं, जिन्हें अनेकता में एकता का भाव सुहाता नहीं है और उन्हें बाहर से खाद-पानी दिया जा रहा है।

ऐसी संस्था व व्यक्ति पर अकुंश का कोई भी निष्ठावान भला विरोध कैसे कर सकता है, लेकिन जब संशोधन में समग्रता, स्पष्टता आदि का अभाव हो तो प्रश्न तो उठेगा ही।

उन्होंने कहा कि कोई भी सरकार इससे नहीं बच सकती कि प्रश्न उठाने वालों की संख्या कम है। एफसीआरए संशोधन विधेयक, 2026 को अल्पसंख्यक विरोधी बताया जा रहा है, जबकि इसका लाभ लेने वाले सभी धर्म के लोग हैं।

इस मुद्दे पर विमर्श ही कम हुआ है, इस कारण सच्चाई कम और अफवाह ज्यादा फैला। लोगों के मन में जितनी शंका है, उसके समाधान का प्रयास भी सरकार के स्तर से न्यूनतम दिखा।

बिल में स्पष्टता का अभाव है
संशोधन बिल कहता है कि किसी संगठन का एफसीआरए सर्टिफिकेट समाप्त होता है, सरकार रद कर देती है, संगठन सरेंडर कर देता है, रिन्यूअल के लिए आवेदन नहीं करता है, आवेदन खारिज हो जाता है, ऐसी स्थिति में विदेशी अंशदान और उससे निर्मित संपत्तियों को सरकार द्वारा बनाई अथारिटी जब्त कर लेगी। यदि निर्माण धार्मिक स्थल का हुआ है तो उसके स्वरूप में कोई बदलाव नहीं किया जाएगा। धार्मिक कार्य पूर्व की तरह संचालित होते रहेंगे।

यहां शंका है कि यदि निर्माण में स्थानीय चंदा और विदेशी राशि दोनों का उपयोग किया गया है तो अथारिटी क्या करेगा? अथारिटी में कौन-कौन होंगे? हिंदू के धार्मिक स्थल का अन्य धर्म के लोगों के माध्यम से संचालन और अन्य धार्मिक स्थलों का हिंदू मान्यता वाले लोगों के माध्यम से संचालन कितना स्वीकार और अनुकूल होगा। इस पर काफी चर्चा की गुंजाइश है।

यह विविधता में एकता के भाव का अनुकूल होगा क्या? उसी तरह शिक्षण संस्थानों को लेकर भी संशय है। यदि अथारिटी संबंधित शिक्षण संस्थान को अपने अधीन कर लेता है तो उसमें कार्यरत शिक्षक और कर्मचारी का क्या होगा, लाभुक बच्चों का भविष्य का क्या होगा? शिक्षण संस्थान और स्वास्थ्य केंद्र के स्वरूप में बदलाव होगा? वह अपने मूल स्वरूप और सेवा में रहेगा या वहां कुछ अन्य कार्य संपादित किए जाएंगे।

गैर सरकारी एजेंसियों के आंकड़ों के अनुसार, एफसीआरए से प्राप्त 85 प्रतिशत से अधिक राशि धार्मिक, शिक्षा, स्वास्थ्य व सामाजिक विकास के कार्यों में लगाए गए हैं। यह क्षेत्र आमजन को प्रत्यक्ष रूप से जोड़ता है। आम सहमति और उठे प्रश्नों के जवाब नहीं मिलने की स्थिति में यह सर्वहित में कहा जा सकता है।

गृह मंत्रालय के अनुसार 2019 से 2022 के बीच 13,520 संगठनों को 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान मिला है। यह राशि कई राज्यों के शिक्षा और स्वास्थ्य के बजट से अधिक है।

बैंक खाता पर पहले से जारी है सख्ती
नई दिल्ली में चिह्नित बैंक में खाता खोले बिना विदेशी अंशदान प्राप्त नहीं किया जा सकता है। सरकार को विदेश से प्राप्त एक-एक रुपये की जानकारी होती है। उसका दुरुपयोग कहां हो रहा है, इसकी पड़ताल के लिए व्यवस्था को और सुदृढ़ किया जा सकता है।

सख्ती के नाम पर कहीं हम ऐसी व्यवस्था को बढ़ावा नहीं दें, जहां अरुचि का भाव उत्पन्न हो जाए और जो राशि अभी जरूरतमंदों तक पहुंच रही है, उससे कहीं वह वंचित हो जाएं।

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