Thursday, June 18, 2026
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राज्यसभा की जंग में बढ़ा सस्पेंस, परिमल नथवानी की सक्रियता से बढ़ी बेचैनी; क्या फिर लिखेंगे जीत की कहानी?

 नई दिल्ली
झारखंड में राज्यसभा की दो सीटों पर चुनाव हो रहे हैं. इन राज्यसभा दो सीटों के लिए तीन उम्मीदवार चुनावी मैदान में किस्मत आजमा रहे हैं, जिसके चलते गुरुवार को वोटिंग होगी. बीजेपी के समर्थित प्रत्याशी परिमल नाथवानी के उतरने से मुकाबला रोचक बन गया है. इसके साथ ही क्रॉस वोटिंग का खतरा भी बन गया है। 

कारोबारी और सांसद के रूप में पहचान रखने वाले नथवानी की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनके चुनावी जीत का रिकॉर्ड है. नथवानी अब तक तीन चुनाव जीत चुके हैं और कोई चुनाव नहीं हारे हैं. चौथी बार राज्यसभा चुनाव के लिए मैदान में उतरे हैं, लेकिन जीत के लिए बीजेपी का समर्थन ही काफी नहीं है। 

झारखंड की सियासत में सीएम हेमंत सोरेन के अगुवाई में जेएमएम और कांग्रेस ने दोनों राज्यसभा सीटें जीतने की रणनीति बनाई है. जेएमएम-कांग्रेस के चक्रव्यूह को तोड़कर क्या परिमल नथवानी एक बार फिर इतिहास रच पाएंगे? 

झारखंड की दो सीट पर 3 प्रत्याशी
झारखंड की दो राज्यसभा सीटों के लिए तीन प्रत्याशी मैदान में है. जेएमएम से बैजनाथ राम और कांग्रेस से प्रणव झा चुनाव लड़ रहे हैं तो निर्दलीय तौर पर परिमल नथवानी किस्मत आजमा रहे हैं. नथवानी को बीजेपी का समर्थन है, जिसके चलते मुकाबला रोचक हो गया है. राज्यसभा की एक सीट जीतने के लिए कम से कम 28 विधायकों का प्रथम वरीयता के आधार पर वोट चाहिए। 

झारखंड विधानसभा में महागठबंधन के पास कुल 56 विधायक हैं, जिनमें जेएमएम के 34, कांग्रेस के 16, आरजेडी के 4 और लेफ्ट के दो विधायक हैं. वहीं, एनडीए के पास 24 विधायक है, जिसमें बीजेपी से 21, आजसू 1, जेडीयू 1, एलजेपी के 1 विधायक हैं. इस तरह से परिमल नथवानी को जीत दर्ज करने के लिए 4 अतरिक्त वोटों की जरूरत है। 

क्रॉस वोटिंग का खतरा मंडरा रहा
विधानसभा में नंबर गेम के लिहाज से जेएमएम की जीत तय है, लेकिन कांग्रेस के लिए महागठबंधन को एकजुट रखना होगा. विधानसभा में महागठबंधन के पास 56 विधायकों का समर्थन है, जिसके लिहाज से दोनों ही सीटें जीत सकती है, लेकिन निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में परिमल नथवानी के उतरने व बीजेपी के समर्थन से मुकाबला रोचक हो गया है. इसके साथ ही क्रॉस वोटिंग का खतरा बनता दिख रहा है। 

राज्यसभा चुनाव जीतने के लिए महागठबंधन के पास नंबर पूरे हैं, लेकिन परिमल नथवानी को बीजेपी के समर्थन करने के बाद भी 4 अतरिक्त वोटों की जरूरत है. ऐसे में क्रॉस वोटिंग का खतरा साफ नजर आ रहा है. नथवानी अपनी जीत के लिए पूरी ताकत लगा दी है तो कांग्रेस और जेएमएम अपने खेमे को बचाए रखने के लिए पूरी ताकत झोंक रखी है। 

परिमल नथवानी कभी चुनाव नहीं हारे 
परिमल नथवानी का झारखंड के साथ पुराना और गहरा नाता है और मंझे हुए सियासी खिलाड़ी हैं. नथवानी मुख्य तर पर कारोबारी हैं और रिलाइंस से जुड़े हुए हैं, लेकिन सियासी पिच पर उतरे तो अपना पहला राज्यसभा चुनाव 2008 में झारखंड से लड़ा. परिमल नथवानी ने निर्दलीय उम्मीदवार को रूप में किस्मत आजमाया था,  लेकिन उन्हें विभिन्न दलों के विधायकों का समर्थन मिला. उस समय क्रॉस वोटिंग ने उनकी राह आसान की और वे राज्यसभा पहुंचने में सफल रहे. आरजेडी के विधायकों का समर्थन उन्हें मिला था, जिसके दम पर जीतने में सफल रहे। 

जेएमएम-कांग्रेस गठबंधन अपने विधायकों को एकजुट रखने की चुनौती से जूझ रहा है. नथवानी की उम्मीदवारी को लेकर एक और दिलचस्प तथ्य यह है कि वे झारखंड की राजनीति में दलगत सीमाओं से ऊपर स्वीकार्यता रखने वाले नेताओं में गिने जाते हैं. ऐसे में सवाल यही है कि क्या परिमल नथवानी अपने अजेय चुनावी रिकॉर्ड को बरकरार रखते हुए चौथी बार राज्यसभा पहुंचेंगे, या फिर झारखंड की बदलती राजनीतिक गणित उनके विजय अभियान पर विराम लगाएगी। 

2014 में नथवानी ने दूसरी बार झारखंड से राज्यसभा का चुनाव लड़ा. भाजपा और आजसू के समर्थन से उन्होंने नामांकन दाखिल किया और निर्विरोध निर्वाचित हो गए. इस जीत ने उन्हें झारखंड से लगातार दूसरी बार राज्यसभा पहुंचाने का रिकॉर्ड दिया. वे झारखंड से दूसरी बार राज्यसभा पहुंचने वाले एकलौते निर्दलीय सांसद बने। 

परमिल नथवानी का तीसरा बड़ा चुनाव 2020 में हुआ, लेकिन इस बार मैदान झारखंड नहीं बल्कि आंध्र प्रदेश को चुनाव. वाईएसआर कांग्रेस पार्टी के समर्थन से वे राज्यसभा के लिए चुने गए और संसद के उच्च सदन में अपना तीसरा कार्यकाल शुरू किया. इस तरह लगातार तीसरी बार राज्यसभा सांसद बने। 
 
नथवानी क्या चौथी बार जीत दर्ज करेंगे
अब 2026 के राज्यसभा चुनाव में परिमल नथवानी ने झारखंड से लड़ने का फैसला किया. एक बार फिर निर्दलीय प्रत्याशी उतरे, लेकिन बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए का समर्थन हासिल है. राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि भाजपा की रणनीति केवल सीट जीतने तक सीमित नहीं है, बल्कि सत्ता पक्ष में संभावित क्रॉस वोटिंग की संभावना को भी भुनाने की है। 

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