Wednesday, September 16, 2026
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मध्य प्रदेश में तीसरी संतान पर कार्रवाई का मामला गरमाया, CM के आश्वासन के बावजूद अधिकारी की सेवा समाप्त

भोपाल
मध्यप्रदेश की नौकरशाही में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने सरकारी नियमों और राजनीतिक घोषणाओं के बीच चल रहे टकराव को उजागर कर दिया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने हाल ही में स्पष्ट कहा था कि दो से अधिक संतान होने के आधार पर किसी कर्मचारी की नौकरी नहीं छीनी जाएगी, लेकिन उनकी घोषणा के बाद ही सिंगरौली के सब-रजिस्ट्रार अशोक सिंह परिहार को तीसरी संतान के आधार पर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

यह फैसला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि जिस नियम के तहत कार्रवाई हुई, उसी नियम को लेकर सरकार बदलाव के संकेत दे चुकी थी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब मुख्यमंत्री राहत का संदेश दे चुके थे, तब विभाग ने इतनी बड़ी कार्रवाई क्यों की?

यह कार्रवाई मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की उस घोषणा के 48 घंटे बाद हुई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि दो से अधिक संतान होने के आधार पर किसी कर्मचारी की नौकरी नहीं जाएगी। अफसर को बर्खास्त करने का आदेश गुरुवार को जारी किया गया। यह शुक्रवार को सामने आया।

CM ने तीन संतान वाला प्रस्ताव किया था रद्द मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 9 जून को सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के उस ड्राफ्ट प्रावधान को निरस्त करने के निर्देश दिए थे, जिसमें दो से अधिक जीवित संतान वाले उम्मीदवारों को सरकारी सेवा के लिए अपात्र घोषित करने का प्रस्ताव था।

मुख्यमंत्री ने ड्राफ्ट को पोर्टल से हटाने और संशोधित प्रस्ताव जारी करने के निर्देश भी दिए थे। इसके बाद माना जा रहा था कि दो से अधिक संतान से जुड़े मामलों में कर्मचारियों को राहत मिल सकती है।

नौकरी के दौरान हुआ तीसरी संतान का जन्म
दरअसल, अशोक सिंह परिहार के खिलाफ शिका
यत की गई थी कि शासकीय सेवा के दौरान उनकी तीसरी संतान का जन्म हुआ है। मामले की जांच के लिए पहले कारण बताओ नोटिस जारी किया गया और बाद में विभागीय जांच बैठाई गई। जांच अधिकारी के रूप में वरिष्ठ जिला पंजीयक जबलपुर पवन अहिरवार को नियुक्त किया गया था।

दरअसल, अशोक सिंह परिहार पर आरोप था कि शासकीय सेवा में रहते हुए उनकी तीसरी संतान का जन्म हुआ। विभागीय जांच में आरोप सही पाए गए और दस्तावेजों के आधार पर यह स्थापित हुआ कि उनकी तीसरी संतान का जन्म 19 नवंबर 2003 को हुआ था। जांच रिपोर्ट के बाद पंजीयन विभाग ने नियमों का हवाला देते हुए बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया।

दिलचस्प बात यह है कि परिहार ने अपनी सफाई में कहा था कि उन्हें इस नियम की जानकारी नहीं थी, लेकिन विभाग ने इस तर्क को खारिज कर दिया। अधिकारियों का मानना था कि 1992 से सरकारी सेवा में रहने वाला कर्मचारी नियमों से अनभिज्ञ होने का दावा नहीं कर सकता।

जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर आरोप सही
जांच में सामने आया कि परिहार की तीसरी संतान अभिषेक सिंह का जन्म 19 नवंबर 2003 को हुआ था। कलेक्टर सिंगरौली की संयुक्त जांच समिति की रिपोर्ट, जन्म संबंधी दस्तावेज और अन्य अभिलेखों के आधार पर आरोप सही पाए गए। जांच अधिकारी ने 9 दिसंबर 2025 को सौंपी अपनी रिपोर्ट में भी परिहार को दोषी माना था।

अफसर ने कहा था- नियम की जानकारी नहीं
जवाब में परिहार ने कहा था कि उन्हें दो से अधिक संतान संबंधी नियम की जानकारी नहीं थी और विभाग की ओर से भी इस संबंध में कोई विशेष जानकारी नहीं दी गई थी। हालांकि विभाग ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। आदेश में कहा गया कि परिहार वर्ष 1992 से नियमित शासकीय सेवा में थे, इसलिए यह मानना संभव नहीं है कि उन्हें सेवा नियमों की जानकारी नहीं थी।

अब इस पूरे घटनाक्रम ने कई नए सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या मुख्यमंत्री की घोषणा केवल भविष्य की नियुक्तियों के लिए थी या वर्तमान कर्मचारियों पर भी लागू होनी थी? यदि सरकार नियम बदलना चाहती थी तो विभागों को स्पष्ट निर्देश क्यों नहीं दिए गए? और सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या एक अधिकारी की नौकरी उस समय चली गई जब सरकार उसी नियम को बदलने की तैयारी में थी?

फिलहाल पंजीयन विभाग का कहना है कि मुख्यमंत्री की घोषणा के अनुरूप अभी तक कोई नया शासकीय आदेश जारी नहीं हुआ है। इसलिए विभाग ने मौजूदा नियमों के तहत कार्रवाई की है। वहीं अशोक सिंह परिहार के पास अब विभागीय अपील और हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने का विकल्प मौजूद है।

यह मामला सिर्फ एक अधिकारी की नौकरी का नहीं, बल्कि शासन और प्रशासन के बीच समन्वय की उस खाई का भी है, जहां एक तरफ राजनीतिक घोषणा होती है और दूसरी तरफ पुरानी व्यवस्था के आधार पर फैसले जारी रहते हैं। आने वाले दिनों में यह मामला कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर बड़ी बहस का विषय बन सकता है।

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