Wednesday, October 7, 2026
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किराए के दो कमरों से सुविधायुक्त भवन तक, भाटापारा आंगनबाड़ी केंद्र को मिला अपना घर

रायपुर

कभी किराए के मकान के महज दो छोटे कमरों में संचालित होने वाला सरगुजा जिले का भाटापारा आंगनबाड़ी केंद्र आज अपने नए और सुविधायुक्त भवन में बच्चों की किलकारियों से गुलजार है। जहां पहले सीमित जगह के कारण बच्चों को बैठने, सीखने और खेल-कूद की गतिविधियों में परेशानी होती थी, वहीं अब रंग-बिरंगे शैक्षणिक चित्रों से सजे भवन में नौनिहाल खेल-खेल में सीख रहे हैं। पर्याप्त जगह मिलने से पोषण, प्रारंभिक शिक्षा और अन्य गतिविधियों का संचालन भी अधिक व्यवस्थित ढंग से हो रहा है।

विकसित भारत-जी राम जी योजना के तहत अम्बिकापुर विकासखंड की ग्राम पंचायत चठिरमा के बढ़निझरिया ग्राम में 11.69 लाख रुपये की लागत से नए आंगनबाड़ी भवन का निर्माण किया गया है। नया भवन बच्चों के साथ गर्भवती और शिशुवती माताओं के लिए भी बेहतर सुविधाओं का केंद्र बना है। भवन निर्माण ने स्थानीय ग्रामीणों के लिए रोजगार के अवसर भी तैयार किए और कार्य के दौरान कुल 439 मानव दिवस का रोजगार सृजित हुआ।

सेवा संकल्प अभियान के बीच भाटापारा आंगनबाड़ी केंद्र में आया यह बदलाव बताता है कि गांव में तैयार होने वाली एक अधोसंरचना किस तरह बच्चों की शिक्षा और पोषण, माताओं की देखभाल तथा स्थानीय ग्रामीणों के रोजगार जैसी कई जरूरतों को एक साथ मजबूती दे सकती है।

दो छोटे कमरों की परेशानी से मिली मुक्ति

पहले भाटापारा आंगनबाड़ी केंद्र किराए के भवन के केवल दो छोटे कमरों में संचालित होता था। सीमित जगह में बच्चों के बैठने से लेकर प्रारंभिक शिक्षा और खेल-कूद की गतिविधियां संचालित करने तक कई व्यावहारिक कठिनाइयां आती थीं।

नए भवन ने इन परिस्थितियों को बदल दिया है। बच्चों को अब गतिविधियों के लिए पर्याप्त स्थान मिल रहा है और आंगनबाड़ी कार्यकर्ता भी पोषण, प्रारंभिक शिक्षा एवं अन्य गतिविधियों को बेहतर ढंग से संचालित कर पा रही हैं। अपना भवन मिलने से केंद्र की सेवाओं के लिए स्थायी और सुविधाजनक स्थान उपलब्ध हुआ है।

60 बच्चों के साथ गर्भवती और शिशुवती माताओं को मिल रहीं सेवाएं

आंगनबाड़ी कार्यकर्ता श्रीमती सुमित्रा व्यापारी बताती हैं कि वर्तमान में केंद्र से कुल 60 बच्चे लाभान्वित हो रहे हैं। इनमें 3 से 6 वर्ष आयु वर्ग के 22 बच्चे तथा 6 माह से 3 वर्ष आयु वर्ग के 38 बच्चे शामिल हैं। इसके साथ ही 8 शिशुवती और 9 गर्भवती माताएं भी केंद्र की सेवाओं से जुड़ी हुई हैं।

बच्चों को नियमित रूप से पोषण आहार उपलब्ध कराया जा रहा है। वहीं गर्भवती और शिशुवती माताओं को पूरक पोषण आहार के साथ पोषण, स्वास्थ्य और स्वच्छता से संबंधित आवश्यक जानकारी भी दी जा रही है। इस तरह नया भवन बच्चों के पोषण और प्रारंभिक शिक्षा के साथ मातृ-शिशु देखभाल से जुड़ी सेवाओं के संचालन का भी बेहतर माध्यम बना है।

रंग-बिरंगी दीवारें बनीं बच्चों की पहली पाठशाला

नए आंगनबाड़ी भवन की दीवारों पर बने अक्षर, शिक्षाप्रद चित्र और आकर्षक कार्टून बच्चों को सहज रूप से अपनी ओर आकर्षित करते हैं। रंगों और चित्रों से सजा वातावरण नौनिहालों के लिए सीखने की प्रक्रिया को रोचक बना रहा है।

अब बच्चे पर्याप्त जगह में बैठकर सीख सकते हैं, खेल सकते हैं और सामूहिक गतिविधियों में हिस्सा ले सकते हैं। आंगनबाड़ी का यह नया स्वरूप बच्चों के लिए केवल पोषण प्राप्त करने का स्थान नहीं, बल्कि खेल, सीख और आनंद से जुड़ी उनकी पहली पाठशाला के रूप में विकसित हो रहा है।

भवन बना तो गांव में रोजगार भी आया

नए आंगनबाड़ी भवन के निर्माण ने बच्चों और माताओं के लिए बेहतर सुविधा तैयार करने के साथ स्थानीय ग्रामीणों के लिए रोजगार भी उपलब्ध कराया। निर्माण कार्य के दौरान कुल 439 मानव दिवस का रोजगार सृजित हुआ।

इस तरह गांव में एक स्थायी परिसंपत्ति के निर्माण के साथ स्थानीय परिवारों को गांव में ही काम मिला। अधोसंरचना निर्माण और ग्रामीण रोजगार का यह जुड़ाव विकास के दोहरे लाभ को सामने लाता है।

एक भवन से बदली बच्चों और माताओं की सुविधा की तस्वीर

भाटापारा आंगनबाड़ी केंद्र में आया बदलाव केवल पुराने किराए के कमरों से नए भवन तक पहुंचने की कहानी नहीं है। यह बच्चों को बेहतर वातावरण, माताओं को जरूरी सेवाएं और ग्रामीणों को रोजगार उपलब्ध कराने की संयुक्त तस्वीर है।

कभी दो छोटे कमरों में सीमित आंगनबाड़ी गतिविधियां आज सुविधायुक्त भवन में विस्तार पा रही हैं। बच्चों के लिए खेलने और सीखने की जगह है, माताओं के लिए पोषण और स्वास्थ्य संबंधी मार्गदर्शन है और गांव के लिए एक स्थायी सार्वजनिक परिसंपत्ति तैयार हुई है।

सेवा संकल्प अभियान के बीच भाटापारा आंगनबाड़ी केंद्र की यह कहानी बताती है कि जब विकास की सुविधा गांव तक पहुंचती है, तो उसका प्रभाव केवल एक भवन तक सीमित नहीं रहता—उसमें बच्चों के बेहतर बचपन, माताओं की बेहतर देखभाल और ग्रामीण परिवारों की आजीविका की उम्मीद भी जुड़ जाती है।

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