Tuesday, October 6, 2026
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1.53 लाख करोड़ की फल-सब्जियों की बर्बादी पर लगेगी लगाम, भारत-ब्रिटेन का बड़ा प्लान

करनाल
भारत में हर साल मेहनत से उगाई गई करोड़ों टन फल और सब्जियां बाजार तक पहुंचने से पहले ही सड़ जाती हैं। इस राष्ट्रीय नुकसान से निपटने और किसानों को उनकी उपज का सही दाम दिलाने के लिए महाराणा प्रताप बागवानी विश्वविद्यालय करनाल और ब्रिटेन के ब्रुनेल विश्वविद्यालय लंदन ने हाथ मिलाया है।

दोनों वैश्विक संस्थानों ने मिलकर सोल टेक नाम से एक महत्वाकांक्षी अनुसंधान परियोजना पर काम शुरू किया है। परियोजना का मुख्य उद्देश्य पूरी तरह से सौर ऊर्जा पर आधारित कोल्ड स्टोरेज और एक मजबूत हार्टिकल्चर कोल्ड चेन नेटवर्क तैयार करना है, जिससे दूरदराज के ग्रामीण इलाकों में भी बिना ग्रिड बिजली या महंगे डीजल के फसलों को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सके।

क्यों पड़ी इस प्रोजेक्ट की जरूरत?
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद और नाबार्ड की रिपोर्ट बताती है कि भारत में उचित कोल्ड स्टोरेज और कोल्ड चेन बुनियादी ढांचे की भारी कमी
है।

सालाना 4 से 5 करोड़ टन फल-सब्जियों की बर्बादी
देश में हर साल कुल उत्पादन का लगभग 6 से 15 प्रतिशत यानि करीब 40 से 50 मिलियन मीट्रिक टन फल और सब्जियां खेत से बाजार तक पहुंचने के दौरान ही खराब हो जाती हैं। टमाटर और हरी सब्जियों जैसी जल्द खराब होने वाली फसलों में यह नुकसान 20 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।

इस बर्बादी के कारण देश को सालाना करीब 1.53 लाख करोड़ का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। कोल्ड स्टोरेज न होने के कारण किसानों को अपनी फसल तुरंत औने-पौने दामों में बेचनी पड़ती है या फिर सड़ाकर फेंकनी पड़ती है।

कैसे काम करेगा सोल टेक मडल जानिये?
एमएचयू और ब्रुनेल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक मिलकर दो प्रमुख मोर्चों पर काम कर रहे हैं।

सौर संचालित डिसेंट्रलाइज्ड कोल्ड स्टोरेज
परंपरागत कोल्ड स्टोरेज बिजली या डीजल जनरेटर पर चलते हैं, जिनकी संचालन लागत बहुत अधिक होती है। सोल टेक के तहत ऐसे सोलर-पावर्ड छोटे और मध्यम स्टोरेज बनाए जा रहे हैं जो गांवों और मंडियों के पास आसानी से स्थापित किए जा सकेंगे।

वैज्ञानिक प्रोटोकाल का विकास
हर फल और सब्जी की प्रकृति अलग होती है। किस फसल को किस तापमान और आर्द्रता पर कितने दिनों तक रखा जा सकता है, इसके लिए दोनों संस्थानों के वैज्ञानिक सटीक वैज्ञानिक गाइडलाइंस और डेटाबेस तैयार कर रहे हैं।

उच्चस्तरीय बैठकों में तय हुई रणनीति
परियोजना को धरातल पर उतारने के लिए एमएचयू, करनाल और ब्रुनेल यूनिवर्सिटी के शीर्ष वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के बीच रणनीतिक बैठकें आयोजित की जा चुकी हैं। इन बैठकों में देश के मैदानी इलाकों की जलवायु परिस्थितियों के अनुसार तकनीकी डिजाइन और डेटा ट्रांसफर पर विस्तृत सहमति बनी है। दोनों संस्थान अब इसके प्रयोगात्मक माडल स्थापित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

किसान फसल को औने-पौने दाम पर बेचने के बजाय सौर कोल्ड स्टोरेज में रखकर बाजार में बेहतर भाव मिलने का इंतजार कर सकेंगे। सौर ऊर्जा के इस्तेमाल से बिजली बिल और डीजल का खर्च खत्म हो जाएगा। डीजल का उपयोग न होने से कार्बन उत्सर्जन में कमी आएगी और हरित कृषि को बढ़ावा मिलेगा। यह अंतरराष्ट्रीय साझेदारी न केवल हरियाणा के बागवानी किसानों के जीवन में क्रांतिकारी बदलाव लाएगी, बल्कि देश में कृषि संकट के समाधान के लिए एक वैश्विक नजीर भी पेश करेगी। -डॉ. एसके मल्हौत्रा, कुलपति महाराणा प्रताप बागवानी विश्वविद्यालय करनाल।

 

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