Friday, August 14, 2026
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पत्थरों पर 2000 साल बाद भी नहीं मिटे चित्र, जानें चीन में प्राचीन कलाकारों ने कैसे किया था कमाल

बीजिंग 
चीन में करीब 2,000 साल पुराने पत्थरों पर बने चित्र आज भी मौजूद हैं. हैरानी की बात ये है कि इन चित्रों ने तेज गर्मी, भारी बारिश, उमस और तूफानों का भी सामना किया, लेकिन फिर भी इनका रंग और आकृतियां लंबे समय तक बची रहीं. अब वैज्ञानिकों ने इन प्राचीन चित्रों की मजबूती का एक बेहद चौंकाने वाला राज खोजा है। 

साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, एक नई रिसर्च के अनुसार, इन चित्रों को बनाने वाले लोग पेंट में इंसानी खून का इस्तेमाल करते थे. इतना ही नहीं, रिसर्चर्स का मानना है कि इस खून का सोर्स हाल ही में बच्चे को जन्म देने वाली महिलाएं हो सकती थीं. यानी प्रसव के दौरान निकले खून का इस आर्ट में इस्तेमाल होता था। 

2,000 साल पुराने हैं ये चित्र
दक्षिणी चीन में वियतनाम की सीमा के पास करीब 260 किलोमीटर लंबे इलाके में जगह- जगह चट्टानों पर बने हजारों साल पुराने चित्र मौजूद हैं. इन्हें हुआशान रॉक आर्ट  के नाम से जाना जाता है. गुआंग्शी स्वायत्त क्षेत्र में मौजूद यह जगह इंसानों, जानवरों, नावों, हथियारों और म्यूजिक स्ट्रूमेंट की तस्वीरों के लिए मशहूर है। 

इन चित्रों को बनाने का श्रेय प्राचीन लुओयूए  लोगों को दिया जाता है. माना जाता है कि ये लोग उस इलाके में रहते थे, जो आज चीन और वियतनाम के सीमावर्ती क्षेत्रों में आता है. इस ऐतिहासिक जगह को 2016 में यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया था। 

तेज गर्मी, बारिश और तूफानों के बाद भी नहीं मिटे
इन चित्रों की सबसे खास बात सिर्फ उनकी उम्र नहीं है. जिस इलाके में ये मौजूद हैं, वहां मौसम काफी मुश्किल है. यहां तेज गर्मी और उमस रहती है. भारी बारिश होती है और अक्सर तूफान भी आते हैं। 

ऐसे मौसम में हजारों साल तक चट्टानों पर बने रंगों का टिके रहना वैज्ञानिकों के लिए लंबे समय से पहेली बना हुआ था. आखिर ऐसा क्या इस्तेमाल किया गया था, जिसकी वजह से ये पेंटिंग्स इतनी टिकाऊ बनी रहीं? अब वैज्ञानिकों को इसका एक हैरान करने वाला जवाब मिला है। 

पेंट में मिलाया गया था इंसानी खून!
जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजिकल साइंस में  प्रकाशित एक नई स्टडी के मुताबिक, इन चित्रों को बनाने के लिए इस्तेमाल किए गए मिश्रण में चूना, लाल मिट्टी और जानवरों के साथ-साथ इंसानी खून भी मिलाया गया था. शोधकर्ताओं ने शानडोंग यूनिवर्सिटी और गुआंग्शी म्यूजियम ऑफ एंथ्रोपोलॉजी के साथ मिलकर इन चित्रों के पेंट के छोटे-छोटे टुकड़ों का अध्ययन किया। 

जांच में सभी पेंट सैंपल में सीरम प्रोटीन मिले. ये खून का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते हैं. इतना ही नहीं, वैज्ञानिकों को इंसानी खून से जुड़े ऐसे प्रोटीन भी मिले जो प्रसव और स्तनपान से संबंधित होते हैं। 

यही वजह है कि वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि इस्तेमाल किया गया इंसानी खून हाल ही में बच्चे को जन्म देने वाली महिलाओं से लिया गया हो सकता है.रिसर्च का एक और दिलचस्प पहलू सामने आया है. वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस प्रक्रिया में बहुत ज्यादा खून की जरूरत नहीं थी.सिर्फ करीब 8 मिलीलीटर खून से एक वर्ग मीटर क्षेत्र को ढकने वाला पेंट तैयार किया जा सकता था। 

वैज्ञानिकों का मानना है कि खून में मौजूद कुछ तत्व चूने के साथ मिलकर एक खास तरह का कैल्शियम कार्बोनेट बनाते थे. इससे पेंट चट्टान की सतह के साथ बेहद मजबूती से जुड़ जाता था. यानी यह पेंट सिर्फ चट्टान के ऊपर चिपका हुआ नहीं था, बल्कि एक तरह से चूना-पत्थर की सतह के साथ जुड़ गया था. रिसर्चर्स ने इसकी मजबूती को इतना असाधारण बताया कि पेंट का सैंपल निकालने के लिए उन्हें इलेक्ट्रिक ड्रिल तक का इस्तेमाल करना पड़ा। 

हालांकि, जहां चट्टान से कैल्शियम कार्बोनेट घिस चुका था, वहां पेंट अपेक्षाकृत आसानी से निकल गया. शोध में यह भी पता चला कि अलग-अलग जगहों पर पेंट का मिश्रण एक जैसा नहीं था.एक साइट से मिले पेंट में करीब 97 फीसदी खून इंसानी था, जबकि पास की दूसरी जगह के सैंपल में लगभग एक-तिहाई हिस्सा गाय के खून का मिला. इससे पता चलता है कि प्राचीन लोग पेंट तैयार करने के लिए इंसान और जानवरों के खून को अलग-अलग अनुपात में इस्तेमाल करते थे। 

डिलीवरी के बाद महिलाओं का खून क्यों?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर इंसानी खून इस्तेमाल हुआ, तो वह कहां से आता था? रिसर्चर्स ने अनुमान लगाया है कि इसे बच्चे को जन्म देने के तुरंत बाद महिलाओं से हासिल किया जाता होगा.इसका संबंध उस समय के लुओयूए समाज की मान्यताओं से हो सकता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस समाज में महिलाओं की प्रजनन क्षमता और मातृत्व को विशेष महत्व दिया जाता था। 

रिसर्च पेपर में यह संभावना जताई गई है कि खून का इस्तेमाल उर्वरता, पवित्रता या पूर्वजों के सम्मान जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक विचारों से जुड़ा हो सकता है. हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि महिलाओं के प्रसव के बाद के खून का इस्तेमाल किए जाने की बात वैज्ञानिकों का अनुमान है, प्रत्यक्ष रूप से साबित तथ्य नहीं। 

पहले कुछ और माना जाता था
इस खोज से पहले वैज्ञानिकों के पास इन चित्रों की मजबूती को लेकर दूसरी थ्योरी थी. माना जाता था कि पेंट बनाने में ऐसे पौधों के रस का इस्तेमाल किया गया होगा, जिनमें ऑक्सैलिक एसिड की मात्रा ज्यादा होती है. लेकिन नए विश्लेषण में पेंट के अंदर पौधों से जुड़े ऐसे अवशेष नहीं मिले. इसके बजाय इंसानी और जानवरों के खून से जुड़े प्रोटीन मिले. इससे खून के इस्तेमाल वाली थ्योरी को मजबूती मिली है। 

इन चित्रों का मकसद सिर्फ सजावट नहीं था?
इन प्राचीन चित्रों को देखकर यह भी सवाल उठता है कि आखिर हजारों साल पहले लोगों ने इतनी मेहनत से इन्हें क्यों बनाया होगा? चित्रों में इंसानों के साथ-साथ नाव, हथियार और संगीत वाद्ययंत्र दिखाई देते हैं. इनमें कुछ ऐसे सामान भी नजर आते हैं जिनका इस्तेमाल धार्मिक या सामुदायिक समारोहों में किया जाता था। 

रिसर्चर्स के मुताबिक, ये चित्र सिर्फ रोजमर्रा की जिंदगी दिखाने के लिए नहीं रहे होंगे. इनमें धार्मिक रस्मों, सामुदायिक पहचान और पूर्वजों के सम्मान का भी महत्व हो सकता है। 

खास बात यह है कि इन चित्रों में किसी एक व्यक्ति पर ज्यादा जोर नहीं दिया गया. इसके बजाय कई आकृतियां साथ दिखाई देती हैं. इससे संकेत मिलता है कि उस समाज में व्यक्तिगत पहचान से ज्यादा पूरे समुदाय को महत्व दिया जाता था। 

क्या लुओयूए समाज मातृसत्तात्मक था?
ऐतिहासिक रिकॉर्ड में लुओयूए समाज को मातृसत्तात्मक बताया गया है. प्राचीन चीनी दस्तावेजों में उनके सामाजिक ढांचे और रिश्तों को लेकर अलग-अलग विवरण मिलते हैं. रिसर्चर्स के मुताबिक, दक्षिण-पश्चिम चीन और लिंगनान इलाके के कई स्थानीय समाजों में हान राजवंश के दौर तक महिलाओं की सामाजिक भूमिका काफी मजबूत थी। 

ऐसे में अगर प्राचीन चित्रों को बनाने में प्रसव के बाद महिलाओं के खून का इस्तेमाल हुआ था, तो यह उस समाज में महिलाओं, मातृत्व और प्रजनन क्षमता के विशेष महत्व की ओर इशारा कर सकता है. हालांकि इस हिस्से को लेकर अभी और रिसर्च की जरूरत है। 

हजारों साल पुराना रहस्य, मिला हैरान करने वाला जवाब
हुआशान के ये चित्र सिर्फ प्राचीन कला के नमूने नहीं हैं. ये उस दौर के लोगों की जिंदगी, उनकी मान्यताओं और सामाजिक व्यवस्था की झलक भी देते हैं. सबसे दिलचस्प बात यह है कि 2,000 साल से ज्यादा पुराने इन चित्रों को बचाने में जिस चीज की भूमिका हो सकती है, वह आज के दौर में सुनकर ही हैरान कर देती है—इंसानी खून। 

 

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