Friday, August 14, 2026
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फैमिली पेंशन के लिए 26 साल तक संघर्ष, आखिर मिला न्याय; शहीद की पत्नी को ₹10 लाख मुआवजा

नई दिल्ली:

सरकारों की उदासीनता कभी-कभी उन लोगों के परिवारों को भी नहीं बख्शती, जिन्होंने देश के लिए अपनी जान दे दी. इसका एक उदाहरण 'शौर्य चक्र' से सम्मानित शहीद मोहन सिंह की पत्नी का दशकों लंबा संघर्ष है. उन्हें अपनी वाजिब 'स्पेशल फैमिली पेंशन' हासिल करने के लिए 26 साल तक इंतजार करना पड़ा. अब सुप्रीम कोर्ट के दखल देने के बाद उन्हें उनका हक मिल सका है. सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अतिरिक्त दस लाख रुपए देने का आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने भारत-चीन सीमा पर सड़क निर्माण के दौरान साथी कर्मचारियों की जान बचाते वक्त शहीद हुए शौर्य चक्र विजेता जनरल रिजर्व इंजीनियरिंग फोर्स यानी GREF कर्मी की पत्नी को बड़ी राहत दी है. कोर्ट ने केंद्र सरकार को शहीद मोहन सिंह की पत्नी कुलदीप कौर को अतिरिक्त 10 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया है। 

जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए असाधारण पारिवारिक पेंशन का फायदा उनके पति की मौत की तारीख से देने का निर्देश दिया है।  

कोर्ट ने कहा कि इस मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए राहत को याचिका दायर करने से पहले के तीन साल तक सीमित नहीं किया जा सकता है। 

क्या है पूरा मामला?

यह मामला दिवंगत मोहन सिंह की पत्नी कुलदीप कौर की अपील से जुड़ा है. मोहन सिंह GREF में ओवरसियर के पद पर तैनात थे और अरुणाचल प्रदेश में हैलियांग-मेटांगलियांग-चागलोहागोम सड़क के निर्माण कार्य के प्रभारी थे. करीब 57 किलोमीटर लंबी यह सड़क भारत-चीन सीमा के लिहाज से रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण थी. 10 जुलाई 2000 को सड़क निर्माण के दौरान एक बेहद खतरनाक और पथरीले स्थान पर काम चल रहा था. इसी दौरान मोहन सिंह ने पहाड़ी के ऊपर से एक बड़ा पत्थर और मलबा निर्माण स्थल की ओर तेजी से आते देखा. उन्होंने तत्काल डोजर और कंप्रेसर ऑपरेटर्स को खतरे से आगाह किया और उन्हें सुरक्षित स्थान पर जाने के लिए कहा. इसके बाद उन्होंने मशीनों को नुकसान से बचाने और वहां काम कर रहे कर्मचारियों की जान बचाने के लिए उपकरणों को सुरक्षित स्थान पर हटाने में मदद की। 

इसी दौरान मोहन सिंह खुद बड़े पत्थर की चपेट में आ गए और करीब 70 मीटर गहरी खाई में गिर गए, जिससे उनकी मौत हो गई. उनके अदम्य साहस और बलिदान के सम्मान में केंद्र सरकार ने उन्हें मरणोपरांत 19 अक्टूबर 2001 को शौर्य चक्र से सम्मानित किया. शौर्य चक्र देश का तीसरा सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार है। 

मोहन सिंह की पत्नी कुलदीप कौर को शुरुआत में सामान्य पारिवारिक पेंशन मिल रही थी. दिसंबर 2005 में उन्होंने CCS Rules, 1939 के तहत विशेष पारिवारिक पेंशन की मांग की. उनका दावा इस आधार पर खारिज कर दिया गया कि उन्हें पहले ही वर्कमेन कॉम्पेंसेशन एक्ट, 1923 के तहत 1,84,170 रुपये मिल चुके हैं. बाद में 2011 में की गई एक और मांग भी खारिज कर दी गई। 

इसके बाद कुलदीप कौर ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का रुख किया. हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने माना कि मोहन सिंह की मौत लागू पेंशन योजना की कैटेगरी ‘C' के अंतर्गत आती है और उन्हें असाधारण पेंशन का लाभ दिया जाना चाहिए. हालांकि, उन्हें पहले मिली मुआवजे की राशि 6 फीसदी ब्याज के साथ वापस करने का निर्देश दिया गया है। 

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने भी कैटेगरी ‘C' के वर्गीकरण को बरकरार रखा, लेकिन याचिका दायर करने से पहले के तीन साल तक ही बकाया सीमित कर दिया. सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष को बरकरार रखा कि मोहन सिंह का मामला कैटेगरी ‘C' में आता है. हालांकि, बेंच ने सवाल उठाया कि विधवा को मिलने वाली आर्थिक राहत को सिर्फ तीन साल तक सीमित क्यों रखा जाए। 

'अधिकार के लिए अदालत जाने को मजबूर नहीं होना चाहिए…'

कोर्ट ने कहा कि मोहन सिंह ने ड्यूटी के दौरान सर्वोच्च बलिदान दिया था और सरकार ने उनके साहस को शौर्य चक्र देकर मान्यता भी दी थी. ऐसी स्थिति में परिवार या विधवा को अपने अधिकार के लिए सामान्य तौर पर अदालतों का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए. बेंच ने यह भी कहा कि इंसाफ पाने में विधवा की तरफ से हुई देरी को इस मामले में राहत देने के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया जा सकता। 

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कोर्ट को बताया कि हाईकोर्ट के फैसले के आधार पर अधिकारियों ने कार्रवाई शुरू कर दी है.  कुलदीप कौर को 14,28,200 रुपये जारी किए जा चुके हैं और उनकी पेंशन भी प्रोसेस कर दी गई है. इसके अलावा, असाधारण पेंशन के बकाए के रूप में 4,12,064 रुपये भी जारी किए गए. अटॉर्नी जनरल ने बताया कि 12 जुलाई 2000 से 12 जुलाई 2015 तक की पेंशन 6,62,268 रुपये बनती है. 6 फीसदी ब्याज जोड़ने पर यह राशि करीब 8.32 लाख रुपए हो जाती है। 

केंद्र की तरफ से यह भी बताया गया कि कुलदीप कौर को वर्कमेन कॉम्पेंसेशन एक्ट के तहत मिले 1,84,170 रुपये ब्याज सहित 2,78,092 रुपये हो जाते हैं और नियमों के मुताबिक 4,62,262 रुपये वापस किए जाने थे. हालांकि, कुलदीप कौर के वकील ने बताया कि वे मूल राशि 1,84,170 रुपये पहले ही वापस कर चुकी हैं. पूरे मामले की परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 13 जुलाई 2000 से 12 जुलाई 2015 की अवधि के लिए कुल 10 लाख रुपये की समेकित राशि तय की। 

'विशेष परिस्थितियों' के तहत राहत…
बेंच ने कहा कि यह राहत संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत और मामले की 'विशेष परिस्थितियों' को देखते हुए दी जा रही है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसने राहत को याचिका दायर करने से पहले के तीन वर्षों तक सीमित नहीं किया है. इसके बजाय, मोहन सिंह की मौत की तारीख से ही लाभ देने का फैसला किया गया है, भले ही याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने पहले बकाया को तीन वर्ष तक सीमित रखने की बात कही थी। 

बेंच ने कहा कि मोहन सिंह की मौत ड्यूटी वक्त हुई थी और सरकार ने अगले ही साल उन्हें मरणोपरांत देश के तीसरे सर्वोच्च शांतिकालीन वीरता पुरस्कार शौर्य चक्र से सम्मानित किया था। 

सुप्रीम कोर्ट ने 5 अगस्त 2026 के आदेश में केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह चार हफ्ते के अंदर कुलदीप कौर को 10 लाख रुपये जारी करे. बेंच ने अटॉर्नी जनरल और संबंधित विभाग की ओर से मामले में त्वरित प्रतिक्रिया के लिए उनकी सराहना भी की। 

 

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