Monday, July 27, 2026
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नई न्याय व्यवस्था लागू हुए दो साल, लेकिन वकीलों को अब भी नहीं याद नई धाराएं, अदालतों में पुरानी धाराओं का असर

इंदौर
कोर्ट कचहरी में इन दिनों वकीलों और जजों के बीच एक दिलचस्प ‘कन्फ्यूजन’ चल रहा है। केंद्र सरकार ने 1 जुलाई 2024 को जब भारतीय दंड संहिता (IPC) और दंड प्रक्रिया संहिता (CRPC) का नाम और चेहरा बदला था, तब लगा था कि वक्त के साथ सब ठीक हो जाएगा।

इस ऐतिहासिक बदलाव को दो साल से ज्यादा का समय बीत जाने के बाद भी कानूनी दिग्गजों की जुबान पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की नई धाराएं चढ़ नहीं पा रही हैं। हालात ये हैं कि कोर्ट में बात आसानी से समझ आ सके, इसलिए याचिकाओं और परिवादों (शिकायत) में नई धारा लिखने के ठीक बगल में कोष्ठक यानी ब्रैकेट ( ) बनाकर पुरानी धारा का पता भी लिखना पड़ रहा है।

वकीलों का कहना है कि ऐसा न करें तो जज साहब को भी मामला समझने में वक्त लगता है, इसलिए ब्रैकेट में ‘पुरानी धारा’ लिखना वकीलों की मजबूरी बन गया है। दिलचस्प बात यह है कि अब कोर्ट के आदेशों में भी सजा सुनाते वक्त ब्रैकेट का सहारा लेना पड़ रहा है।

केस-1: कोर्ट को समझाना पड़ा, धारा 175 ही पुरानी 156 (3) है
अधिवक्ता शैलेंद्र द्विवेदी ने आईएएस संतोष वर्मा के खिलाफ ब्राह्मण बेटियों के संदर्भ में की गई टिप्पणी से आहत होकर कोर्ट में निजी परिवाद दायर किया। सीआरपीसी में परिवाद धारा 156 (3) के तहत दायर होता था। नई व्यवस्था (बीएनएसएस) में यह धारा बदलकर 175 हो गई है। कोर्ट में मामला उलझे नहीं, इसलिए वकील साहब ने अर्जी में धारा 175 लिखने के साथ कोष्ठक में धारा 156(3) का भी उल्लेख किया, ताकि केस आसानी से स्वीकार हो सके।

केस-2: ‘साहब, मुवक्किल नहीं आया’… 317 नहीं, धारा 55 कहिए
अदालत में जब किसी मामले का पक्षकार (आरोपी या गवाह) किसी कारणवश समय पर नहीं आ पाता तो वकील कोर्ट में हाजिरी माफी का आवेदन लगाते हैं। सालों से इसके लिए सीआरपीसी की धारा 317 के तहत आवेदन देने की परंपरा थी। अब बीएनएसएस में इसकी जगह धारा 55 हो गई है। कोर्ट में वकील धारा 55 का आवेदन पेश करते हैं तो साथ में कोष्ठक में (पुरानी धारा 317) लिखना नहीं भूलते। उन्हें डर रहता है कि नई धारा के चक्कर में मुवक्किल की जमानत निरस्त न हो जाए।

पुराने मामलों में भी ‘डबल मेहनत’
जो अपराध 1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज हुए थे, उनके निराकरण में तो और भी माथापच्ची हो रही है। केस का फैसला बीएनएसएस की धाराओं के तहत हो रहा है, लेकिन अपराध के समय जो धाराएं प्रचलित थीं, उनका संदर्भ देना जरूरी है। हत्या के एक मामले में कोर्ट ने जब आरोपियों को सजा सुनाई, तो अर्थदंड (जुर्माना) न भरने की दशा में होने वाली जेल के लिए बीएनएसएस की नई धारा के साथ-साथ सीआरपीसी की पुरानी धारा का भी कोष्ठक में विशेष तौर पर जिक्र किया गया।

नया ‘फैशन’ बनी पॉकेट बुक
कोर्ट परिसर में आजकल अधिकांश वकीलों की जेब में एक छोटी ‘पॉकेट बुक’ सजी दिखाई दे जाती है। जैसे ही कोर्ट रूम में बहस के दौरान किसी धारा का जिक्र आता है, वकील तुरंत पॉकेट बुक में धारा देखने लगते हैं।

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