Friday, June 26, 2026
Google search engine
Homeदेशनागरिकता पर बॉम्बे हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, कहा- पासपोर्ट कभी भी नागरिकता...

नागरिकता पर बॉम्बे हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, कहा- पासपोर्ट कभी भी नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं रहा

मुंबई 

भारतीय नागरिकता के प्रमाण को लेकर चल रही बहस के बीच एक बार फिर यह सवाल केंद्र में आ गया है कि आखिर किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता तय करने का अंतिम आधार क्या है. कानूनी सूत्रों और उपलब्ध प्रावधानों के अनुसार, भारत में नागरिकता से जुड़े सवालों के निपटारे के लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 ही मुख्य और कानून है. यही कानून तय करता है कि कौन भारतीय नागरिक हो सकता है, किन आधारों पर नागरिकता प्राप्त की जा सकती है और किन परिस्थितियों में नागरिकता समाप्त भी हो सकती है. बॉम्‍बे हाईकोर्ट 13 साल पुराने एक मामले में भारतीय पासपोर्ट और इंडियन सिटिजनशिप पर बड़ा फैसला दिया था। 

सूत्रों के मुताबिक, आम धारणा के विपरीत पासपोर्ट, आधार कार्ड, पैन कार्ड, मतदाता पहचान पत्र या अन्य पहचान संबंधी दस्तावेज अपने आप में किसी व्यक्ति की भारतीय नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं हैं. इन दस्तावेजों का अपना प्रशासनिक और वैधानिक महत्व जरूर है, लेकिन इनका उद्देश्य मुख्य रूप से ट्रैवल की अनुमति देना, पहचान स्थापित करना, कर व्यवस्था, कल्याणकारी सेवाओं का लाभ या चुनावी प्रक्रिया से जुड़ी जरूरतों को पूरा करना है. नागरिकता का सवाल इन दस्तावेजों से ऊपर उठकर नागरिकता अधिनियम, 1955 में निर्धारित कानूनी कसौटियों पर तय होता है। 

क्‍या है एक्‍सपर्ट की राय?
जानकारों का कहना है कि नागरिकता अधिनियम भारत में राष्ट्रीयता के प्रश्न पर सबसे महत्वपूर्ण कानून है. इसके तहत नागरिकता जन्म, वंश, रजिस्‍ट्रेशन, नैचुरलाइजेशन और किसी क्षेत्र के भारत में विलय जैसे विभिन्न आधारों पर प्राप्त की जा सकती है. साथ ही यह कानून यह भी स्पष्ट करता है कि कौन सी श्रेणियां ऐसी हैं, जिन्हें नागरिकता पाने के अधिकार से बाहर रखा गया है. खासतौर पर अवैध प्रवासी यानी ऐसे लोग जो बिना वैलिड दस्तावेज या कानूनी अनुमति के भारत में आए हों या तय शर्तों का उल्लंघन करते हुए यहां रह रहे हों, उनके लिए नागरिकता प्राप्त करने के अधिकांश रास्ते बंद हैं। 

गैर-नागरिकों को भी मिल चुका है पासपोर्ट?
सूत्रों के अनुसार, कानून में नागरिक और अवैध प्रवासी के बीच यह स्पष्ट विभाजन महज तकनीकी व्यवस्था नहीं, बल्कि देश की संप्रभुता, आंतरिक सुरक्षा और नागरिक अधिकारों की रक्षा से जुड़ा विषय है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि नागरिकों के लिए निर्धारित संवैधानिक अधिकारों, सरकारी लाभों और कानूनी सुरक्षा का अनुचित इस्तेमाल ऐसे लोग न कर सकें, जिनके पास भारत में रहने का वैध आधार ही नहीं है. इसी संदर्भ में पासपोर्ट को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की गई है. सूत्रों का कहना है कि पासपोर्ट को भारतीय नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना कोई नया फैसला नहीं है. यह न तो हाल में लिया गया कोई निर्णय है और न ही पिछले कुछ वर्षों में बदली हुई व्याख्या. कानूनी रूप से पासपोर्ट कभी भी नागरिकता का अंतिम और निर्विवाद प्रमाण नहीं रहा है. पासपोर्ट अधिनियम, 1967 में भी ऐसे प्रावधानों का उल्लेख मिलता है, जिनके तहत कुछ विशेष परिस्थितियों में गैर-नागरिकों को भी पासपोर्ट जारी किया जा सकता है। 

बॉम्‍बे हाईकोर्ट का 13 साल पुराना फैसला
सूत्रों का कहना है कि 2013 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में साफ कहा था कि पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता. इस पृष्ठभूमि में यह समझना महत्वपूर्ण है कि पासपोर्ट, आधार, पैन या वोटर आईडी जैसे दस्तावेज किसी व्यक्ति की पहचान, निवास, करदाता स्थिति या चुनावी पंजीकरण को दर्शा सकते हैं, लेकिन नागरिकता का अंतिम परीक्षण नागरिकता अधिनियम, 1955 और उससे जुड़े कानूनी प्रावधानों के आधार पर ही होगा. ऐसे में नागरिकता को लेकर उठ रहे सवालों के बीच कानूनी स्थिति यही है कि भारत में नागरिकता का निर्धारण भावनात्मक या दस्तावेजों की सामान्य उपलब्धता से नहीं, बल्कि विधि द्वारा निर्धारित शर्तों और प्रमाणों के आधार पर किया जाएगा. यही वजह है कि नागरिकता के मुद्दे पर किसी भी दावे की जांच में मूल कानून और उसके तहत तय मानदंडों को ही सर्वोपरि माना जाता है। 

RELATED ARTICLES

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

- Advertisment -
Google search engine

Most Popular

Recent Comments